मनुष्य के सामने यह सवाल हमेशा से रहा है कि परमात्मा वास्तव में है भी या नहीं। यदि है तो उससे मिलाप कैसे हो सकता है।इस विषय पर कई ग्रंथ पोथियां लिखी गई, पर इसका सही जवाब वक्त के पूर्ण संत सतगुरु जी दे सकते है क्यो कि वे परमात्मा से मिलाप कर चुके होते है। उनके अनुभव के आधार पर उनके पास प्रत्यक्ष प्रमाण होता है। वे हमें बताते है कि जब से हम सृष्टि में आए है, उसी समय से हम परमात्मा की तलाश में इधर उधर भटक रहे है। जब कि परमात्मा हमारे अंदर है।
गुरु ग्रंथ साहिब में पेज न.1346 पर गुरु अमरदास जी ने फरमाया है।
“ हर मंदर एह सरिर है ज्ञान रत्न परघट होई”
असल में हरि मंदिर यह शरीर है। इसी शरीर में परमात्मा रूपी ज्ञान रत्न का अनुभव होगा। इसीलिए संत महात्मा कहते है कि मालिक की भक्ति, मालिक की खोज केवल अपने शरीर के अंदर जाकर ही करनी है।
संत महात्मा न केवल इस सच्चाई को साबित करते है कि परमात्मा है, बल्कि वे ये भी कहते है कि परमात्मा सिर्फ “एक” है। यानी परमात्मा ही सच है, परमात्मा ही सब कुछ है, उसके सिवाय दूसरा कोई नहीं है जो इस सृष्टि को चला रहा है।ये मालिक की बनाई अपनी रचना है
गुरु ग्रंथ साहिब में पेज न.463 पर गुरु नानकदेव जी ने फरमाया है।
“आपी ने आप साजिए, आपि ने रचिए नाउ।। कुदरत साजिए कर आसन डीठो चाउ।।”
उसने स्वयं को स्वयं बनाया; उन्होंने खुद ही अपना नाम मान लिया।दूसरी बात यह है कि उन्होंने सृष्टि का निर्माण किया; सृष्टि के भीतर बैठा हुआ, वह उसे प्रसन्नता के साथ देखता है।