ब्रह्मचर्य के लाभ

डॉक्टर निकलसन कहते हैं कि स्त्रियों और पुरुषों में शरीर का सबसे अच्छा रक्त संतानोत्पत्ति के तत्त्वों को बनाने में खर्च होता है । एक पवित्र जीवन जीनेवाले मनुष्य में वीर्य का तत्त्व शरीर में दुबारा जज़्ब होता है और रक्त के प्रवाह में मिलकर उत्तम शारीरिक , दिली और दिमागी ताक़त को बनाता है , जिससे मनुष्य शक्तिवान बन जाता है और चौदह – चौदह , सोलह – सोलह घंटे शारीरिक काम करके भी थकता नहीं ।

अगर ब्रह्मचर्य क़ायम रहे तो हमारे लिए साधारण आहार भी काफ़ी होगा और दवाइयों का बाज़ार ठंडा पड़ जाएगा । अगर ब्रह्मचर्य को धारण किया जाए तो जीवन पवित्र हो जाएगा ; शरीर , हृदय और मस्तिष्क मज़बूत हो जाएँगे , मनुष्य दीर्घायु प्राप्त करेंगे और क्रोध और विषयों के उद्वेगों पर काबू पा सकेंगे । वे सच्चे , पवित्र , कोमल – हृदय , अहिंसक और अच्छे चाल – चलनवाले बन जाएँगे । हमारी संतान हमारी आगे आनेवाली पीढ़ी के सच्चे हीरे – जवाहरात बन जाएगी ।

सब महात्माओं की ओर से और धर्मपुस्तकों में शील को धारण करने का दृढ़ उपदेश है । शिव – संहिता ( 4:88 ) में लिखा है , “ मरणं बिन्दुपातेन जीवनं है । बिंदुधारणे । ” वीर्य की रक्षा जीवन है और वीर्य का पात मृत्यु है।

सत्संग का फायदा होगा जब हम अमल करेगें

एक संत ने अपने दो शिष्यों को दो डिब्बों में मूँग के दाने दिये और कहाः “ये मूँग हमारी अमानत हैं। ये सड़े गले नहीं बल्कि बढ़े-चढ़े यह ध्यान रखना। दो वर्ष बाद जब हम वापस आयेंगे तो इन्हें ले लेंगे संत तो तीर्थयात्रा के लिए चले गये इधर एक शिष्य ने मूँग के डिब्बे को पूजा के स्थान पर रखा और रोज उसकी पूजा करने लगा। दूसरे शिष्य ने मूँग के दानों को खेत में बो दिया। इस तरह दो साल में उसके पास बहुत मूँग जमा हो गये।

दो साल बाद संत वापस आये और पहले शिष्य से अमानत वापस माँगी तो वह अपने घर से डिब्बा उठा लाया और संत को थमाते हुए बोलाः “गुरूजी ! आपकी अमानत को मैंने अपने प्राणों की तरह सँभाला है। इसे पालने में झुलाया,आरती उतारी, पूजा-अर्चना की संत बोलेः “अच्छा ! जरा देखूँ त सही कि अन्दर के माल का क्या हाल है ?” संत ने ढक्कन खोलकर देखा तो मूँग में घुन लगे पड़े थे। संत ने शिष्य को मूँग दिखाते हुए कहाः “क्यों बेटा ! इन्ही घुनों की पूजा अर्चना करते रहे इतने समय तक !”शिष्य बेचारा शर्म से सिर झुकाये चुपचाप खड़ा रहा। इतने में संत ने दूसरे शिष्य को बुलवाकर उससे कहाः “अब तुम भी हमारी अमानत लाओ।”थोड़ी देर में दूसरा शिष्य मूँग लादकर आया और संत के सामने रखकर हाथ जोड़कर बोलाः “गुरूजी ! यह रही आपकी अमानत।”संत बहुत प्रसन्न हुए और उसे आशीर्वाद देते हुए बोलेः “बेटा ! तुम्हारी परीक्षा के लिए मैंने यह सब किया था। मैं तुम्हें वर्षों से जो सत्संग सुना रहा हूँ, उसको यदि तुम आचरण में नहीं लाओगे, अनुभव में नहीं उतारोगे तो उसका भी हाल इस डिब्बे में पड़े मूँग जैसा हो जायेगा।

मन का शिकार – उसे वश में करना

एक ग्रामीण शिकारी के जीवन पर आधारित यह पद मन को वश में करने का सुझाव देता है । शिकार पर जाते हुए पति से शिकारी की पत्नी कहती है कि हे पतिदेव , किसी जीवित प्राणी की हत्या न करना , परन्तु मरा हुआ , रक्त तथा मांस से हीन शिकार लेकर भी घर न आना । भाव यह है किमनुष्य का असली शिकार मन है जिसका कोई शरीर और रूप नहीं है , परन्तु जो फिर भी संसाररूपी वन में बेखटके दौड़ रहा है । मनुष्य अपने अन्तर में स्थित अपने घर सतलोक में तभी वापस जा सकता है जब वह इस बिना चोच , खुर सिर और शरीर के पशु का शिकार कर ले . अर्थात् अपने मन को वश में कर ले । परन्तु मन को वश में करने का अर्थ इसे केवल संसार के मोह से मुक्त करना है , संसार के काम – काज से छुट्टी दिला देना नहीं । परमार्थी को भी अपने सांसारिक कर्तव्य निभाने होते हैं और इसके लिये उसे अपने मन को संसार में सक्रिय तो रखना ही पड़ता है , मगर यह काम वह मन को वश में रखते हुए भी , उसे संसार में अनासक्त रखते हुए भी कर सकता है ।

शिकारी की पत्नी अपने पति को दूसरे किनारे के शिकारी ( परम – धाम को प्राप्त कर चुके परमार्थी ) का उदाहरण देते हुए प्रेरित करती है कि देखो , उस शिकारी ने डोर – रहित धनुष से ऐसे हिरन का शिकार किया है जिसका सिर नहीं है और उसका वध करके भी उसे जीवित रखा है । यह गुरु के प्रदान किये हुए ज्ञान की महिमा है । तात्पर्य यह है कि हमें अपने मनरूपी मृग को साधारण शिकारियों के से बाण से नहीं , बल्कि ध्यान के धनुष पर सुमिरन का बाण चढ़ाकर उसके द्वारा मारना है । इस प्रकार मारा हुआ मन दुनिया की ओर से मृत रहकर आन्तरिक रूहानी मण्डलों के प्रति जीवित हो जाता है । पद के अन्त में कबीर कहते हैं कि प्रभु , तुझसे मिलने के लिये व्याकुल मैं वृक्ष से लिपटना चाहती एक लता के समान हूँ , परन्तु इस लता में सांसारिक कामना और वासना के पत्ते नहीं हैं ।

जीवत जिनि मारै मूवा मति ल्यावै , मास बिहूँणॉन घरि मत आवै हो कंता ॥ टेक ॥ उर बिन पुर बिन चंच बिन , बपु ‘ बिहूँना सोई । सो स्यावज ‘ जिनि मारैं कंता , जाकै रगत मास न होई ॥ पैली पार के पारधी , ताकी धुनहीं पिनच नहीं रे । ता बेली ‘ को ढूँक्यो मृग लौ ‘ , ता मृग के सीस नहीं रे । मास्या मृग जीवता राख्या , यहु गुरु ग्याँन मही रे । कहै कबीर स्वामी तुम्हारे मिलन कौ , बेली है पर पात नहीं रे ।  कबीर ग्रंथावली , पृ . 119

गुरु की चिट्ठी

एक गृहस्थ भक्त अपनी जीविका का आधा भाग घर में दो दिन के खर्च के लिए पत्नी को देकर अपने गुरुदेव के पास गया। दो दिन बाद उसने अपने गुरुदेव को निवेदन किया के अभी मुझे घर जाना है। मैं धर्मपत्नी को दो ही दिन का घर खर्च दे पाया हूं । घर खर्च खत्म होने पर मेरी पत्नी व बच्चे कहाँ से खायेंगे। गुरुदेव के बहुत समझाने पर भी वो नहीं रुका। तो उन्होंने उसे एक चिट्ठी लिख कर दी। और कहा कि रास्ते में मेरे एक भक्त को देते जाना। वह चिट्ठी लेकर भक्त के पास गया। उस चिट्ठी में लिखा था कि जैसे ही मेरा यह भक्त तुम्हें ये खत दे तुम इसको 6 महीने के लिए मौन साधना की सुविधा वाली जगह में बंद कर देना। उस गुरु भक्त ने वैसे ही किया। वह गृहस्थी शिष्य 6 महीने तक अन्दर गुरु पद्धत्ति नियम, साधना करता रहा परंतु कभी कभी इस सोच में भी पड़ जाता कि मेरी पत्नी का क्या हुआ, बच्चों का क्या हुआ होगा ??
उधर उसकी पत्नी समझ गयी कि शायद पतिदेव वापस नहीं लौटेंगे।तो उसने किसी के यहाँ खेती बाड़ी का काम शुरू कर दिया। खेती करते करते उसे हीरे जवाहरात का एक मटका मिला। उसने ईमानदारी से वह मटका खेत के मालिक को दे दिया। उसकी ईमानदारी से खुश होकर खेत के मालिक ने उसके लिए एक अच्छा मकान बनवा दिया व आजीविका हेतु ज़मीन जायदात भी दे दी ।अब वह अपनी ज़मीन पर खेती कर के खुशहाल जीवन व्यतीत करने लगी।जब वह शिष्य 6 महिने बाद घर लौटा तो देखकर हैरान हो गया और मन ही मन गुरुदेव के करुणा कृपा के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने लगा कि सद्गुरु ने मुझे यहाँ अहंकार मुक्त कर दिया । मै समझता था कि मैं नहीं कमाकर दूंगा तो मेरी पत्नी और बच्चों का क्या होगा ?? करनेवाला तो सब परमात्मा है। लेकिन झूठे अहंकार के कारण मनुष्य समझता है कि मैं करनेवाला हूं। वह अपने गुरूदेव के पास पहुंचा और उनके चरणों में पड़ गया। गुरुदेव ने उसे समझाते हुए कहा बेटा हर जीव का अपना अपना प्रारब्ध होता है और उसके अनुसार उसका जीवन यापन होता है। मैं भगवान के भजन में लग जाऊंगा तो मेरे घरवालों का क्या होगा ?? मैं सब का पालन पोषण करता हूँ मेरे बाद उनका क्या होगा यह अहंकार मात्र है। वास्तव में जिस परमात्मा ने यह शरीर दिया है उसका भरण पोषण भी वही परमात्मा करता है।

प्रारब्ध पहले रच्यो पीछे भयो शरीर
तुलसी चिंता क्या करे भज ले तू रघुवीर

परमात्मा बुद्धि की शक्ति से नहीं पाया जा सकता

परमात्मा बुद्धि की शक्ति से नहीं पाया जा सकता और न ही तर्क यानी दलील के द्वारा उसके होने का सबूत दिया जा सकता है । वह कैसा है , कहाँ है आदि के बारे में सब सोच – विचार व्यर्थ है ।

कबीर साहिब कहते हैं : बासुरि गमि न रैणि गमि , नाँ सुप . तरगम ‘ । कबीर तहाँ बिलंबिया , जहाँ छाहड़ी न घंम ।

अर्थात् न वहाँ दिन की पहुँच है , न रात की और न ही वहाँ सपनों के घोड़े पर सवार होकर पहुंचा जा सकता है । कबीर उस स्थान पर विश्राम कर रहा है जहाँ न धूप है न छाँह ।

परमात्मा सुख और दुःख , भले और बुरे , स्वर्ग और नरक आदि सब प्रकार के द्वैत से परे है । उसकी कल्पना नहीं की जा सकती । संत उस परम चेतन के धाम में विचरते हैं । जो प्रभु को पा लेते हैं वे तर्क और वाद – विवाद में नहीं उलझते , जैसा कि कबीर साहिब ने कहा है , जो देखै सो कहै नहि , कहै सो देखै नाहिं ।

शरीर के अंदर यदि एक बार अभ्यासी परमात्मा को अपने अंदर प्रकट कर ले तो बाहर भी वह उसकी मौजूदगी कण – कण में देखता है । संत कहते हैं कि जब भक्त भगवान को अपने शरीर के अंदर देख लेता है तभी वह उसे सृष्टि के कोने – कोने में देख सकता है । कबीर साहिब कहते हैं कि जब तक मैं स्थूल शरीर के कामकाज में उलझा हुआ था तब तक परमात्मा मुझ से अलग था । जब मैंने अपने अंतर में उसका ज्ञान पा लिया तो जहाँ कहीं भी मैं देखता हूँ , केवल उसे ही पाता हूँ :

जहाँ जहाँ जाइ तहाँ तहाँ राँमा , हरि पद चीन्हि कियौ बिश्रामा ॥ तन रंजित तब देखियत दोई , प्रगट्यौ ग्यान जहाँ तहाँ सोई ॥ लीन निरंतर बपु बिसराया , कहै कबीर सुख सागर पाया ॥

एक सच्चे साधक के लिए परमात्मा शरीर के अंदर ही है । वह किसी जंगल , गुफा या पर्वत में नहीं है । न वह मनुष्य के बनाए हुए किसी मंदिर , मसजिद या गिरजे में रहता है और न ही उसे किसी मूर्ति या चित्र में सीमित किया जा सकता है । कबीर साहिब कहते हैं कि हमारे शरीर के अंदर ही वह अघट यानी शरीर रहित , अपार प्रभु रहता है , घट मह खेलै अघट अपार

कबीर साहिब आश्चर्य प्रकट करते हैं कि वह शरीर रहित परमात्मा मनुष्य के शरीर में रहता है , फिर भी लोग उसे प्राप्त करने की कोशिश नहीं करते : बसे अपंडी पंड 2 मैं , ता गति लखै न कोइ । कहै कबीरा संत हौ , बड़ा अचंभा मोहि ॥

ईसा मसीह समझाते हैं : ख़ुदा की बादशाहत न यहाँ है , न वहाँ है , वह तुम्हारे अंदर है ।

इसी प्रकार कबीर समझाते हैं कि वह परमात्मा कहीं भी कम या ज़्यादा मात्रा में नहीं है , वह सबमें पूर्ण रूप से व्याप्त है , घटि बधि कहीं न देखिये , ब्रह्म रह्या भरपूरि । और तेरा साहिब तुज्झ में , अंत कहूँ मत जाय ॥

अपनी प्रसिद्ध वाणी ‘ बावन अखरी ‘ में कबीर साहिब कहते हैं कि वह जो तुम्हारे निकट , तुम्हारे शरीर में है , उसको छोड़कर क्यों भटकते हो ? जिसकी तलाश में दुनिया भटक रही है , उसे मैंने अपने निकट ही पाया है । ढढा ढिग 4 ढूढह कत आना ॥ ढूढत ही ढह गए पराना ॥ इसी पद में आगे कहते हैं कि मैंने उसे सभी दिशाओं में , यहाँ तक कि ऊँची पर्वत – श्रेणियों में ढूँढ़ा परंतु नहीं पा सका । जब मैंने अपने अंदर देखा तो जिह गड़ गडिओ सो गड़ मह पावा ॥ अर्थात् जिसने इस गढ़ ( शरीर ) को बनाया है , उसे मैंने इस गढ़ में ही पा लिया ।

हार- जीत का फैसला

बहुत समय पहले की बात है। आदि शंकराचार्य और मंडन मिश्र के बीच सोलह दिन तक लगातार शास्त्रार्थ चला। शास्त्रार्थ में निर्णायक थीं- मंडन मिश्र की धर्म पत्नी देवी भारती।

हार- जीत का निर्णय होना बाक़ी था, इसी बीच देवी भारती को किसी आवश्यक कार्य से कुछ समय के लिये बाहर जाना पड़ गया।

लेकिन जाने से पहले देवी भारती नेँ दोनों ही विद्वानोँ के गले मेँ एक- एक फूल माला डालते हुए कहा, येँ दोनों मालाएँ मेरी अनुपस्थिति मेँ आपके हार और जीत का फैसला करेंगी। यह कहकर देवी भारती वहाँ से चली गईँ। शास्त्रार्थ की प्रकिया आगे चलती रही।

कुछ देर पश्चात् देवी भारती अपना कार्य पुरा करके लौट आईं। उन्होंने अपनी निर्णायक नजरों से शंकराचार्य और मंडन मिश्र को बारी- बारी से देखा और अपना निर्णय सुना दिया। उनके फैसले के अनुसार आदि शंकराचार्य विजयी घोषित किये गये और उनके पति मंडन मिश्र की पराजय हुई थी।

सभी दर्शक हैरान हो गये कि बिना किसी आधार के इस विदुषी ने अपने पति को ही पराजित करार दे दिया। एक विद्वान नें देवी भारती से नम्रतापूर्वक जिज्ञासा की- हे ! देवी आप तो शास्त्रार्थ के मध्य ही चली गई थीँ फिर वापस लौटते ही आपने ऐसा फैसला कैसे दे दिया ??

देवी भारती ने मुस्कुराकर जवाब दिया- जब भी कोई विद्वान शास्त्रार्थ मेँ पराजित होने लगता है, और उसे जब हार की झलक दिखने लगती है तो इस वजह से वह क्रुध्द हो उठता है और मेरे पति के गले की माला उनके क्रोध की ताप से सूख चुकी है जबकि शंकराचार्य जी की माला के फूल अभी भी पहले की भांति ताजे हैं। इससे ज्ञात होता है कि शंकराचार्य की विजय हुई है।

विदुषी देवी भारती का फैसला सुनकर सभी दंग रह गये, सबने उनकी काफी प्रशंसा की।

दोस्तों क्रोध मनुष्य की वह अवस्था है जो जीत के नजदीक पहुँचकर हार का नया रास्ता खोल देता है। क्रोध न सिर्फ हार का दरवाजा खोलता है बल्कि रिश्तों मेँ दरार का कारण भी बनता है। इसलिये कभी भी अपने क्रोध के ताप से अपने फूल रूपी गुणों को मुरझाने मत दीजिये।

अनमोल वचन

हमारी प्रार्थनाएँ और अरदासें व्यर्थ हैं , जब तक कि हम अपनी ओर से द्वार खोलने की पूरी कोशिश के द्वारा उन्हें सबल नहीं बनाते । सतगुरु जानते हैं कि नाम के लिए हमारी इच्छा और प्यास दिखावटी है । हमारी प्रार्थनाएँ निष्कपट और सच्ची नहीं हैं । हमारा मन अभी भी दुनिया और उसके पदार्थों की कामनाओं से भरा हुआ है । वह वासनाओं और लोभ में डूबा हुआ है ; सांसारिक मान – बड़ाई और यश के पीछे भाग रहा है । वह हर दम ग़रूर और अकड़ में रहता है । याद रखिए , सतगुरु को धोखा नहीं दिया जा सकता । जब तक उससे मिलाप की तड़प तीव्र और सच्ची नहीं है , वह ख़ामोश रहता है और ध्यान नहीं देता । ।

~सरदार बहादुर महाराज जगत सिंह जी

एक कथा -मेरी भी और आपकी भी


बहुत समय पहले की बात है, एक राजा जंगल में शिकार खेलने गया, संयोगवश वह रास्ता भूलकर घने जंगल में जा पहुँचा। उसे रास्ता ढूंढते-ढूंढते रात्रि हो गई और वर्षा होने लगी। राजा बहुत डर गया और किसी प्रकार उस भयानक जंगल में रात्रि बिताने के लिए विश्राम का स्थान ढूंढने लगा।

कुछ दूरी पर उसे एक दीपक जलता हुआ दिखाई दिया। वहाँ पहुँचकर उसने एक बहेलिये की झोंपड़ी देखी। वह बहेलिया ज्यादा चल-फिर नहीं सकता था, इसलिए झोंपड़ी में ही एक ओर उसने मल-मूत्र त्यागने का स्थान बना रखा था, अपने खाने के लिए जानवरों का मांस उसने झोंपड़ी की छत पर लटका रखा था।

वह झोंपड़ी बड़ी गंदी, छोटी, अंधेरी और दुर्गंधयुक्त थी। उस झोंपड़ी को देखकर पहले तो राजा ठिठका, लेकिन उसने सिर छिपाने का कोई और आश्रय न देखकर उस बहेलिये से अपनी झोंपड़ी में रात भर ठहरने देने के लिए प्रार्थना की।
बहेलिये ने कहा कि आश्रय के लोभी राहगीर कभी – कभी यहाँ आ भटकते हैं। मैं उन्हें ठहरा तो लेता हूँ, लेकिन दूसरे दिन जाते समय वे बहुत झंझट करते हैं।

उन्हें इस झोंपड़ी की गंध ऐसी भा जाती है कि फिर वे उसे छोड़ना ही नहीं चाहते और इसी में ही रहने की कोशिश करते हैं एवं अपना कब्जा जमाते हैं। ऐसे झंझट में मैं कई बार पड़ चुका हूँ, इसलिए मैं अब किसी को भी यहां नहीं ठहरने देता। मैं आपको भी इसमें नहीं ठहरने दूंगा।
राजा ने प्रतिज्ञा की, कि वह सुबह होते ही इस झोंपड़ी को अवश्य खाली कर देगा। यहाँ तो वह संयोगवश भटकते हुए आया है, उसे तो सिर्फ एक रात काटनी है।

तब बहेलिये ने राजा को वहाँ ठहरने की अनुमति दे दी, पर सुबह होते ही बिना कोई झंझट किए झोंपड़ी खाली करने की शर्त को दोहरा दिया। राजा रात भर एक कोने में पड़ा सोता रहा।

सोने में झोंपड़ी की दुर्गंध उसके मस्तिष्क में ऐसी बस गई कि सुबह जब उठा तो वही सबसे परम प्रिय लगने लगा। राजा जीवन के वास्तविक उद्देश्य को भूलकर वहीं निवास करने की बात सोचने लगा। और बहेलिये से वहीं ठहरने की प्रार्थना करने लगा।

इस पर बहेलिया भड़क गया और राजा को भला-बुरा कहने लगा।

राजा को अब वह जगह छोड़ना झंझट लगने लगा और दोनों के बीच उस स्थान को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया।

कथा सुनाकर शुकदेव जी महाराज ने “परीक्षित” से पूछा, “परीक्षित” बताओ, उस राजा का उस स्थान पर सदा के लिए रहने के लिए झंझट करना उचित था?

परीक्षित ने उत्तर दिया, भगवन् ! वह राजा कौन था, उसका नाम तो बताइये? मुझे वह तो मूर्ख जान पड़ता है, जो ऐसी गंदी झोंपड़ी में, अपनी प्रतिज्ञा तोड़कर एवं अपना वास्तविक उद्देश्य भूलकर, नियत अवधि से भी अधिक वहाँ रहना चाहता है। उसकी मूर्खता पर तो मुझे आश्चर्य होता है।

श्री शुकदेव जी महाराज ने कहा, हे राजा परीक्षित! वह बड़े भारी मूर्ख तो स्वयं आप ही हैं।

इस मल-मूत्र की गठरी “देह(शरीर)” में जितने समय आपकी आत्मा को रहना आवश्यक था, वह अवधि तो कल समाप्त हो रही है। अब आपको उस लोक जाना है, जहाँ से आप आएं हैं। फिर भी आप मरना नहीं चाहते। क्या यह आपकी मूर्खता नहीं है ?”

राजा परीक्षित का ज्ञान जाग गया और वे बंधन मुक्ति के लिए सहर्ष तैयार हो गए।

“वस्तुतः यही सत्य है।”

जब एक जीव अपनी माँ की कोख से जन्म लेता है तो अपनी माँ की कोख के अन्दर भगवान से प्रार्थना करता है कि, हे भगवन् ! मुझे यहाँ (इस कोख) से मुक्त कीजिए, मैं आपका भजन-सुमिरन करूँगा। और जब वह जन्म लेकर इस संसार में आता है तो (उस राजा की तरह हैरान होकर) सोचने लगता है कि मैं ये कहाँ आ गया (और पैदा होते ही रोने लगता है)

फिर धीरे धीरे उसे उस गंध भरी झोंपड़ी की तरह यहाँ की खुशबू ऐसी भा जाती है कि वह अपना वास्तविक उद्देश्य भूलकर यहाँ से जाना ही नहीं चाहता है।

यही कथा मेरी भी है, और आपकी भी है

भगवान

भगवान

जब भगवान ने मछली का निर्माण करना चाहा, तो उसके जीवन के लिये उनको समुद्र से वार्ता करनी पड़ी।
जब भगवान ने पेड़ों का निर्माण करना चाहा, तो उन्होंने पृथ्वी से बात की।
लेकिन जब भगवान ने मनुष्य को बनाना चाहा, तो उन्होंने खुद से ही विचार विमर्श किया।

तब भगवान ने कहा: “मुझे अपने आकार और समानता वाला मनुष्य का निर्माण करना है और उन्होंने अपने समान मनुष्यों को बनाया।”

अब यह बात ध्यान देने योग्य है:

यदि आप एक मछली को पानी से बाहर निकालते हैं तो वह मर जाएगी; और जब आप जमीन से एक पेड़ उखाड़ते हैं, तो वह भी मर जाएगा।

इसी तरह, जब मनुष्य भगवान से अलग हो जाता है, तो वह भी ‘मर’ जाता है।

भगवान हमारा एकमात्र सहारा है। हम उनकी सेवा और शरणागति के लिए बनाए गए हैं। हमें हमेशा उनके साथ जुड़े रहना चाहिए क्योंकि केवल उनकी कृपा के कारण ही हम ‘जीवित’ रह सकते हैं।

अतः भगवान से जुड़े रहें।

हम देख सकते हैं कि मछली के बिना पानी फिर भी पानी है लेकिन पानी के बिना मछली कुछ भी नहीं है।

पेड़ के बिना पृथ्वी फिर भी पृथ्वी ही है, लेकिन प्रथ्वी के बगैर पेड़ कुछ भी नहीं …

इसी तरह, मनुष्य के बिना भगवान, भगवान ही है लेकिन बिना भगवान के मनुष्य कुछ भी नहीं !

इस युग में भगवान से जुड़ने के एकमात्र सरल उपाय का शास्त्रों में वर्णन है; सत्संग और सतगुरू का उपदेश,नाम का सिमरन

पूरे जीवन का अनुभव

चार्ली चैपलिन 88 वर्ष जीये
उन्होंने हमारे लिए 4 बातें बतलाई:
(1) इस दुनिया में कुछ भी हमेशा के लिए नहीं है, हमारी समस्याएं भी नहीं हैं।
(2) मुझे बारिश में घूमना बहुत पसंद है क्योंकि कोई भी मेरे आँसू नहीं देख सकता।
(3) जीवन का सबसे खोया हुआ दिन वह दिन होता है जब हम हँसते नहीं हैं।
(4) दुनिया के छह सर्वश्रेष्ठ डॉक्टर …:

  1. सूरज
  2. आराम
  3. व्यायाम
  4. आहार
  5. स्वाभिमान
  6. दोस्त

अपने जीवन के सभी चरणों में इनके साथ रहें और स्वस्थ जीवन का आनंद लें …
यदि आप चाँद को देखते हैं, तो आप भगवान की सुंदरता देखेंगे …
यदि आप सूर्य को देखते हैं, तो आप भगवान की शक्ति देखेंगे …
यदि आप एक दर्पण देखते हैं, तो आप ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ रचना देखेंगे,तो यकीन मानिए।
हम सभी पर्यटक हैं, भगवान हमारे ट्रैवल एजेंट हैं जिन्होंने पहले से ही हमारे मार्गों, बुकिंग और स्थलों की पहचान की है … उस पर भरोसा करें और जीवन का आनंद लें।
जीवन बस एक यात्रा है! इसलिए, “आज को भरपूर जिये” !
कल हो सकता है न होगा!

Create your website with WordPress.com
Get started