मनुष्य जन्म: एक अवसर part-2

आगरा के महान संत स्वामी जी महाराज अपनी बानी में फरमाते है:

“नर देही तुम दुर्लभ पाई।

अस औसर फिर मिले न आय।।

“आप मनुष्य जन्म की महत्ता के बार में बता रहे है कि ऐसा दुर्लभ मौका हमें मिला है, फिर ऐसा मौका मिले या ना मिले , इसीलिए इसका हम फायदा उठाना है। ये मालिक की अपार कृपा हुई है तो ये मनुष्य का जामा उसने अनेक हमारे संचित कर्मो के अंदर दया करके ऐसा कर्मो का मेल जोल बनाया है कि ये शिरोमणि मनुष्य का दुर्लभ जामा हमें बक्षा है।गोस्वामी जी वचन है:

” बड़े भाग मानुष तन पावा”स्वामी जी महाराज जी एक अन्य जगह फरमाया है:”ये तन दुर्लभ तुमने पाया, कोट जनम भटका जब खाया”कहते है भाई आसानी से नहीं मिला है ये मनुष्य जनम , करोड़ो जन्म भटकने के बाद मिला है।

तो गुरु अर्जुन देव जी आदि ग्रंथ में पृष्ठ स 176 पर बताया है कि कौन कोन सी योनियों में भटकने के बाद यह मनुष्य रूपी अनमोल जामा मिला है आप फरमाते है

कई जनम भए कीट पतंगा। कई जनम गज मीन कुरंगा।।कई जनम पंखी सरप होइयो।कई जनम हेवर भ्रीख जोयो।।मिल जगदिस मिलन की बरिया, चिरांकाल ये देह संजारिया।।”

हम कई जन्मों में कीट बने, पतंगा बने, मछली, हाथी हिरण जैसे जन्म हुए। फिर कई जन्मों में हम पंखी बने, सांप बने, पेड़ बने। लेकिन अब मालिक की बड़ी कृपा, दया हुई है, बड़ी देर के बाद ये मनुष्य जामा मिला है। ये मालिक से मिलाप की बारी है भाई! पर मिलाप केसे करे भाई!जब तक हम अपने कर्मो से मुक्त नहीं हो जाते तब तक हम परमात्मा से मिल नहीं सकते। तो क्या करे कि हमारे कर्मो का लेखा खत्म हो जाए। 

स्वामी जी महाराज के वचन है:

अब यह देह मिल कृपा से,करो भक्ति जो कर्म दहा।”

वो भक्ति करनी है , वो करनी करनी है जो कर्मो के दायरे से हमारी आत्मा को बाहर कर सके वो कोनसी करनी है, 

आदि ग्रंथ में पांचवी पातशाही पृष्ठ स 12 में फरमाया है

“मिल साधसंगत भज केवल नाम”

पूरे संत महात्मा की संगत और सत्संग में जाना है उनके चरण सरण में जाना है।” भज केवल नाम ” केवल नाम  या शब्द (पॉवर)है जो हमारी आत्मा को उससे मिलने की अवस्था में के जा सकता है। जीवन मुक्त अवस्था की अवस्था में लें जा  सकता है।उस सच्चे शब्द, उस सच्चे नाम के साथ लिव जोड़ना है। हमारे मन में शायद कहीं शंका ना रह जाय कि हर मनुष्य जामें के बाद फिर मनुष्य का जामा मिल जाना है

तो स्वामी जी महाराज फरमाते है कि ऐसा नहीं है भाई!

अस औसर फिर मिले ना आय”

फिर ऐसा मौका नहीं मिलता है हमें संत दादू दयाल जी भी यही फरमाते है:

बार बार ये तन नहीं, नर नारायणी देह।दादू बहुर न पाइए, जनम अमोलक येह।।

ये अनमोल जन्म है भाई बार बार नहीं मिल सकता। इसके अंदर आकर मालिक की सच्ची भक्ति, सत्संग में लगकर सच्चा नाम जो कुल मालिक का रूप है उससे लीव जोड़नी है।और उसके साथ मिलाप का सच्चा आनंद लेना है।

Published by Pradeep Th

अनमोल मनुष्य जन्म और आध्यात्मिकता

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