कबीर साहिब हमारी पूरी अवस्था अपनी बानी के जरिए बयान कर रहे है

जब लग तेल दीवे मुख बाती तब सुझे सभ कोई।।
तेल जले बाती ठहरानी सुन्ना मंदर होई।।
रे बावरे तुह घरी न राखै कोई।।
तू राम नाम जप सोई।।
का की मात पिता कहूं का को कवन पुरख की जोई।।
घट फूटे कोऊ बात न पूछे काढ़ह काढ़ह होई।।
देहूरी बैठी माता रोवे खाठिया ले गए भाई
लट छिटकाए तिरिया रोए हंस इकेला जाई।।
जिन सांसारिक संबंधों को पालने के लिए लोग अनगिनत मुसीबतें सहते है, दुष्कर्म करते है, उनकी अस्थिरता का चित्र खींचते हुए कबीर साहिब बताते है कि जब सांसो का तेल खत्म होने पर जीवन की बत्ती बुझ जाती है और काया का मंदिर सुनसान हो जाता है तो इसे कोई आधी घड़ी भी घर में रखता, सबको इससे पल्ला छुड़ाने की जल्दी हो जाती है। जीवन रूपी मटके के टूटने पर न जीव का कोई बाप रहता है, न मां, न पत्नी, सब उसकी ओर से मुंह मोड़ लेते है। अति प्यार करने वाली पत्नी बाल बिखेरने से अधिक कुछ नहीं कर सकती, माता घर की चौखट तक ही चलकर खड़ी हो जाती है,भाई स्वय उसको शमशान भूमि में उठाकर ले जाते है। इस प्रकार बड़े परिवार वाला जीव एक, अकेला रह जाता है।
इसलिए हमे मनुष्य के इस कीमती मोके का फायदा लेना है और भक्ति में लगना है….. .. कैसे? कल की पोस्ट में जरूर पढ़े।