परमात्मा तक पहुंचने की कुंजी या सीढ़ी-1

परमेश्वर तक पहुंचना कोई हंसी मजाक की बात नहीं।वह तो मानो किसी मजबूत किले में बैठा हुआ है और वह क़िला है मोटी पथरीली दीवारों और वज्र के मजबूत कपाटोवला। न दीवारे ढह सकती है, न कपाट ही टूटते है।इसलिए उसके अंदर जाने के लिए कोई उपाय नहीं बनता। हां, अगर एक सीढ़ी मिल जाए, मजबूत डंडों वाली और ठेठ शिखर को छूने वाली, ऊंची,तब ही क़िले में दाखिल हुआ का सकता है। प्रसंत्ता की बात यह है कि सतगुरु के रूप में ऐसी सीढ़ी मिल जाए, परन्तु उस जिसके भाग्य अच्छे हो।

आदि ग्रंथ ( पृष्ठ स 17) में गुरु नानक देव जी फरमाते है:

गुरु पौड़ी बेड़ी गुरु, गुरु तुलहा हरि नाउ।।

गुरु सर सागर बोहिथो, गुरु तीरथ दरिआऊ।।

सतगुरु परमेश्वर रूपी किले की दीवार पर चढ़ने के लिए सीढ़ी का कार्य पूरा करता है, वैसे ही वह भवसागर को पार करने के लिए नाव या जहाज बन जाता है। वह नाम की दात बक्षता है और उसके दिए हुए नाम की कमाई पार उतार देती है।

आदि ग्रंथ ( पृष्ठ स 205) में गुरु अर्जुनदेव जी फरमाते है:
जिस का गृह तिन दीआ ताला, कुंजी गुर सौपाई।।अनिक उपाव करे नहीं पावे, बिन सतगुरु सर्णाई।।

सिरजन हार ने अपने अंशो – आत्माओं- के साथ एक अपनी ही तरह का खेल रचा है। उनको ख़ुद से जुदा किया, उनके हृदय में अपने मूल से जुड़ने की तड़प रखी और फिर उसी हृदय के एक कोने में अपना अदृश्य महल बनाकर बैठ गया। महल में आत्मा अपने आप दाखिल नहीं हो सकती।उस पर ताला लगा हुआ है। वह पक्का ताला तारों या पत्तियों से नहीं खुलता। उसकी कुंजी (चाभी) गुरु को सौंप दी गई है, गुरु की कुंजी के सिवाय और कोई काम चलाऊ कुंजी किसी लोहार के द्वारा नहीं बनाई जा सकती। जो भी गुरु की प्रसंता प्राप्त कर लेगा, अंदर जा पहुंचेगा। उससे अलावा चाहे हजार उपाय कर ले, सालो के साल, जन्मों के जन्म लगा ले, सफलता कदापि नहीं मिलेगी।..………… बाकी का कल की पोस्ट में…

Published by Pradeep Th

अनमोल मनुष्य जन्म और आध्यात्मिकता

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