
नाम- भाग 1
अगर कोई नदी पार करनी हो तो यात्री मल्लाह की शरण लेता है और मल्लाह उसे अपनी नाव में बिठा लेता है। जीवात्मा के खेवट – सतगुरू के बारे में विचार किया जा चुका है। अब एक दृष्टि उसकी नाव – “नाम “- पर भी डाल ली जाए।
संत्मत या गुरूमत को नाम मार्ग या शब्द मार्ग भी कहा जाता है क्योंकि इसमें नाम या शब्द के अभ्यास द्वारा आत्मा को परमात्मा में लीन करने का उपदेश दिया जाता है। संत सतगुरु अपनी शरण में आने वाले जिज्ञासु को नाम या शब्द की कमाई का साधन और नाम के अभ्यास द्वारा सूरत को अंतर में शब्द में लीन करने कि विधि समझाते है, जिसे सुरत शब्द योग भी कहा जाता है।
नाम या शब्द दो प्रकार का है। संतो महात्माओं ने परमात्मा के अनंत गुणों के आधार पर उसके जो अनेक नाम रखे है उन्हें वर्णनात्मक, गुणवाचक या सिफाती नाम या शब्द कहा है। नाम या शब्द का दूसरा भेद धुनात्मक है। धुनात्मक़ नाम या शब्द परमात्मा से आ रही शक्ति को वह ध्वनि है जो ध्यान को आंखो के पीछे और मध्य एकाग्र करने से सुनाई देती है संतो महात्माओं ने इसे सच्चा शब्द या सच्चा नाम भी कहा है।अनंत भाषाओं में रखे गए परमात्मा के सब वर्णनात्मक नाम जैसे राम, भगवान, गोविंद, मुरारी, ईश्वर, खुदा, गॉड, वाहेगुरु सब नाम स्थान या काल की सीमा में है, परन्तु अंतर में आत्मा द्वारा अनुभव किया जाने वाला सच्चा नाम या शब्द परमात्मा की तरह अमर और अविनाशी है। यह नाम अंदर है, बाहर नहीं।
आदि ग्रंथ पृष्ठ स 1026 पर गुरु नानक साहिब कहते है:
देही अंदर नाम निवासी।। आपे करता है अबिनासी।।आप कहते है कि नाम हमारे अंदर है और अविनाशी कर्ता का रूप है।
आदि ग्रंथ पृष्ठ स 293पर गुरु अर्जुन देव जी कहते है:
नउ निधि अमृत प्रभ का नाम।। देही मह इस का विश्राम।।
नाम को अमृत कहा गया है क्योंकि यह आत्मा को अमर कर देता है। इसे जीवनदाता, मुक्तिदाता, ज्ञानदाता, आनंददाता, सहजदाता आदि कहा गया है। यह हमारी देह में ही मौजूद है।
संत महात्मा समझाते है कि अलग अलग भाषाओं में रखे गए परमात्मा के अनेक नाम है, लेकिन आंखो के पीछे आत्मा के अनुभव में आने वाला सच्चा नाम एक ही है।परमात्मा शब्द या नाम का भण्डार है। उसका वास्तविक स्वरूप शब्द या नाम है। परमात्मा, शब्द या नाम सबका स्वरूप एक ही है। परमात्मा नाम का सागर है, सृष्टि की रचना करने वाला नाम उसकी लहर है और आत्मा उसकी बूंद है। परमात्मा, शब्द और आत्मा सजातीय है। तीनो का असल एक है।हर प्रकार के कर्म, धर्म, संयम, जप, तप, तीर्थ आदि शुभ कर्मो का फल नाम की कमाई में शामिल है।
रामचरितमानस (1:21:4) में गोस्वामी तुलसीदास जी कहते है:
चहुं जुग चहुं श्रुति नाम प्रभाऊ। कलि बिसेषी नहि आन उपाऊ।।
फरमाते है कि चारो युगों और चारो वेदों में केवल नाम ही को मुक्ति का साधन माना गया है, कलयुग में तो नाम के मुक्ति का कोई दूसरा साधन है ही नहीं।
इसी विषय को सार वचन संग्रह, 38:मास 3:11 में स्वामी जी महाराज ने फरमाया है:
कलयुग कर्म धर्म नहि कोई। नाम बिना उद्धार न होई।।
नाम की कमाई द्वारा साधक में भी उन सद् गुणों का प्रवेश हो शुरू हो जाता हैं जो नाम या प्रभु में हैं। वास्तव में शब्द या नाम कि कमाई द्वारा साधक प्रभु में समाकर उसका ही रूप हो जाता हैं
