
नाम का अभ्यास बड़ा उत्तम कर्म है, मनुष्य का उद्धार ही इसकी कमाई करने से होता है। पर आम संसारी अपनी समझ में आकर प्रभु का कोई भी एक नाम चुन लेते है और उसकी आराधना शुरू कर देते है।से सोचते है कि सब नाम उसी के है और यह ठीक भी है; लेकिन नाम की कमाई का मतलब गुरु से मिले नाम कि कमाई है:
आदि ग्रंथ के पृष्ठ स 423 पर गुरु अमरदास जी ने फरमाया है
नाम तेरा सभ कोई लेत है जेती आवण जानी।।जा तुध भावे ता गुरमुख बूझे होर मनमुख फिरे इआनी।।आप कहते है कि मनमुख लोग अपनी बुध्दि के अनुसार नाम तो परमात्मा का लेते है , पर परमात्मा को वो ही नाम भाता है जो गुरमुख यानी गुरु हमे बताते है।जब परमेश्वर किसी पर मेहरबान होता है तब वह गुरु से नाम लेकर उसका अभ्यास करता है इसी तरह लिए गए नाम के अभ्यास के द्वारा ही सफलता प्राप्त होती है। जो नासमझ अपने मन के हठ के आधार पर खुद का चूना हुआ कोई नाम लेने में लगे रहते है, वे व्यर्थ समय बर्बाद करते है। उनके हाथ पल्ले कुछ नहीं आता।
आदि ग्रंथ के पृष्ठ स 33 पर गुरु अमरदास जी ने फरमाया है
अधि आतम करम के करे नाम न कब ही पाई
अगर कोई समझे कि मै अपने मन की रुचि के अनुसार शुभ माने जाने वाले कर्मो से नाम प्राप्त कर लूंगा, तो यह उसकी भूल होगी।
आदि ग्रंथ के पृष्ठ स 29 पर गुरु अमरदास जी ने फरमाया है
सुख सागर हरि नाम है गुरमुख पाया जाई।।नाम, जो अनेक सुखो का भण्डार है, केवल गुरु से ही मिलता है।
आदि ग्रंथ के पृष्ठ स 284 पर गुरु अर्जुन देव जी ने फरमाया है
सत नाम प्रभ का सुखदाई।।बिस्वास सत नानक गुर ते पाई।।
सच्चा नाम बहुत सुख देने वाला है, अगर उसका अभ्यास भरोसे के साथ किया जाए। यह भरोसे अपने आप नहीं, गुरु से प्राप्त होता है।
Continue…