
संक्षेप में शब्द ( धुनात्मक नाम) से मतलब अनाहत या अनहद शब्द है, वह शब्द जो प्रभु का पैदा किया हुआ है और जो बिना किसी साज, यंत्र आदि की सहायता के दिन रात निरंतर हर एक के अंदर हो रहा है।
इस शब्द में – जो सतपुरूष का अपना ही विस्तार है – ध्वनि के अलावा प्रकाश का भी गुण है और ये दोनों ( ध्वनि और प्रकाश), आंखो के पीछे, भोहों के बीच में, उस स्थान पर अनुभव किए जाते हैं जिसे घर – दर, मुक्ति का द्वार, तीसरा तिल, शिव नेत्र आदि नाम दिए गए है।
इस नाम या शब्द को अलग अलग महात्माओं ने हमे अलग अलग कोमों, मुल्कों, मजहबों में अलग अलग लफ्जो के जरिए समझाने की कोशिश की है। ऋषियों ने उसको आकाशवाणी, रामनाम, राम धुन, निर्मल नाद, दिव्य ध्वनि कहकर याद किया है। हजरत ईसा ने उसी नाम को वर्ड, लॉगास, स्पिरिट, होली घोस्ट, नेम कहा है। मुसलमान फकीरों ने उसी नाम को कलमा, बांगे आसमानी, कलामे इलाही, निदाए सुल्तानी कहा है। गुरु नानक जी ने उसे गुर की बाणी, धुर की बाणी, सच्ची बानी, अमर, हुक्म, अकथ कथा, हरि कीर्तन कहकर याद किया है। आम संतो महात्माओं ने उसको शब्द या नाम कहकर समझाने कि कोशिश करी है।
इस शब्द की ध्वनि को सुनना या उसकी ज्योति को देखना केवल हमारी निजी कोशिश से संभव नहीं होता।
आदि ग्रंथ में पृष्ठ स 1045 पर गुरु अमरदास जी फरमाते है:
सचे सबद सची पत होई। बिन नावै मुकत न पावै कोई।। बिन सतगुर को नाउ न पाए, प्रभ ऐसी बनत बनाई हे।।
मालिक का ऐसा विधान है कि किसी पूर्ण गुरु से दीक्षा ( नामदान) ली जाती है और उनकी बताई गई युक्ति के अनुसार इसका अभ्यास किया जाता है। नाम के सिमरन में प्रगति होने पर शब्द प्रकट होता है और स्थिर हुआ शब्द सुरत या आत्मा को उच्च आध्यात्मिक मंडलों की ओर खींचने लगता है। फिर एक समय आता है जब आत्मा मन और माया के बंधन से मुक्त हो जाती है, अपने आपको पहचान लेती है। यही आत्म पहचान है जिसे self realisation before God realisation भी कहते है। फिर आत्मा शब्द स्वरूप गुरु( जो परमात्मा का रूप होता है) में लीन हो जाती है और अंत में उसकी दया मेहर से सतपुरूष में जा समाती है, उसी प्रकार जैसे प्रियतम सागर से बिछुड़ी जल की बूंद लहर में समाकर अपने मूल के साथ एक रूप हो जाती है।
Mind-blowing
Even can’t think
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