त्याग शब्द का अर्थ है किसी वस्तु या विचार को मन से छोड़ देना। पर आध्यात्मिक रूप से त्याग का मतलब है कर्मो के फल का त्याग करना अथवा निष्काम कर्म करना। यदि कोई मनुष्य बिना फल की इच्छा के कोई कर्म करे तो उसे निष्काम कर्म कहते है। क्योंकि हम कर्म किए बिना रह नहीं सकते है। यही भागवत गीता में अध्याय 3 श्लोक 5 में लिखा है।

और इसी कारण हमे कर्म करने पड़ते है और हम इस संसार के झाल में फस जाते है। पर भगवान कृष्ण ने गीता में इससे बचने या निकलने का उपाय निष्काम कर्म बताया है। क्योंकि यही सच्चा त्याग है । भागवत गीता में अध्याय 18 में भगवान कृष्ण ने श्लोक 9,10,11,12 में सच्चे त्याग के बारे में हमारा मार्गदर्शन किया है ।




भागवत गीता में ऐसे कहीं पहलू है जो हमको परमात्मा तक पहुंचने के लिए हमारा मार्ग दर्शन करते है। इसके बारे में आने वाले दिनों में पोस्ट में जरूर बात करेंगे।