असली फकीरी

एक राजा ने किसी फकीर संत की प्रशंसा के किस्से सुने तो उसके दर्शन करने वहां पहुंच गए। मुलाकात के बाद राजा ने औपचारिकतावश फकीर से कहा, ”महात्मा जी, आप इस सूखे पेड़ के नीचे रह रहे हैं, यह मुझे अच्छा नहीं लगा। मेरा आपसे अनुरोध है कि आप मेरे राजमहल में चलकर वहां रहें।” जब फकीर ने राजा का अनुरोध स्वीकार कर लिया तो राजा मुश्किल में पड़ गया क्योंकि उसने तो उस फकीर को यह बात दिखावे के तौर पर ही कही थी। आखिर अनमने दिल से राजा उस फकीर को अपने साथ महल में ले आया। राजा ने सोचा कि ये फकीर तो नकली निकला। फकीर होकर भी राजमहल में रहना चाहता है। चूंकि राजा सार्वजनिक रूप से अनुरोध करके उसे अपने साथ लाया था, इसलिए अब वो उस फकीर को राजमहल से जाने के लिए कह भी नहीं सकता था लेकिन यह बात तय थी कि राजा के दिल में उसके प्रति रत्ती भर भी सम्मान न था।

दूसरी तरफ अपनी फकीरी में मस्त, प्रसन्नचित्त चेहरे और आनंद के साथ वह फकीर राजमहल में रह रहा था। राजा यह दृश्य देखकर और अधिक दुखी व परेशान हो जाता कि सूखे पेड़ के नीचे रहने वाला यह अदना सा फकीर महल के मजे लूट रहा है। फकीर जितना प्रसन्न और आनंदपूर्ण दिखता, राजा ये बातें सोच-सोचकर उतना ही दुखी हो जाता। दो- तीन महीने बाद राजा ने फकीर का शाही शयनकक्ष बदल दिया और सोने के लिए एक साधारण सा कमरा दे दिया। फकीर के सेवकों में भी काफी कमी कर दी गई और उसका भोजन भी सामान्य सा दिया जाने लगा। पर इन सब बातों से फकीर की मस्ती और चेहरे की रौनक में कोई कमी न आई। राजा यह देखकर कुछ आश्चर्य करता। अब तो उसने फकीर के नजदीक जाना ही छोड़ दिया। वह तो किसी न किसी बहाने उसे महल से चलता कर देने की फिराक में था। इसी तरह चार-पांच महीने बीत गए।

अब राजा ने फकीर को तंग और परेशान करने के प्रयास शुरू कर दिए। अपने सेवकों को कहकर फकीर के रहने का स्थान बहुत ही गंदी जगह कर दिया। सुबह जब स्नान की बारी आती तो फकीर को घंटों प्रतीक्षा करनी पड़ती क्योंकि उससे पहले वहां बीसियों लोग स्नान करने को खड़े होते। अब फकीर की सेवा में कोई सेवक भी न था। उसे भोजन भी अब बहुत देरी से मिल पाता। कई बार तो सारा-सारा दिन ही भोजन नसीब न होता और फकीर चुपचाप भूखे पेट ही सो जाता। राजा ने सोचा कि इन हालातों में तो यह फकीर स्वयं ही उनसे यहां से चले जाने की अनुमति मांग ही लेगा लेकिन जब राजा ने फकीर को देखा तो वह भौंचक्का रह गया।

फकीर की मस्ती और उसके चेहरे के नूर में अब भी कोई कमी न आई थी बल्कि वह तो उसी उल्लास, उमंग, प्रसन्नता और आनंद से जी रहा था। अब तो राजा से रहा न गया। फकीर के समीप जाकर उसने पूछा, ”महात्मा जी, आपसे एक बात पूछना चाहता हूं।” फकीर कुछ इस तरह से मुस्कराकर बोल उठा, जैसे उसे पहले से ही पता था कि राजा उससे क्या पूछने वाला है, ”क्यों राजन! एक सवाल पूछने में ही आपने छह महीने लगा दिए?” राजा प्रश्न भरी दृष्टि से फकीर को देखने लगा तो फकीर ने कहा, ”राजन्! आपने क्या सोचा कि मैं राजमहल के ठाट-बाट और शाही जीवन का मजा लेने के लिए यहां आया था? मैंने तो केवल आपका अनुरोध स्वीकार किया था। आप क्या समझते हैं कि फटे-पुराने, मैले वस्त्र धारण करने वाले, सूखी रोटी खाते, पेड़ के नीचे सोते आदमी को ही फकीर कहते हैं। राजन! फकीरी का मतलब दु:ख, दरिद्रता, कष्ट, परेशानी, अभावों, संकटों को सहन करना नहीं है बल्कि फकीरी का मतलब तो सर्व- स्वीकार से है। ईश्वर ने जैसा भी रखा है, जहां भी रखा है, उसको पूर्ण रूप से स्वीकार करने वाला ही फकीर होता है। विपत्तियां, कष्ट, दु:ख, संकट और अभाव हमारे आनंद और मस्ती में तनिक भी कमी नहीं कर सकते हैं और न ही भौतिक सुख-सुविधाएं, ऐश्वर्य, वैभव फकीर के उत्साह, उमंग और उल्लास में कोई वृद्घि कर सकते हैं।”

राजा फकीर की ये सब बातें सुन-सुनकर बहुत शर्मिन्दा हुआ जा रहा था। फकीर ने राजा की मनोदशा को समझ लिया था, इसलिए उनसे कहा, ”राजन! आप शर्मिन्दा और दुखी न हों। आप ही नहीं बल्कि सब लोग ऐसा ही समझते हैं, जैसा आपने सोचा पर अब आपको तो मालूम हो ही गया है कि फकीरी का मतलब क्या है? हम फकीर तो विकट से विकट और सुखद से सुखद हर परिस्थिति में आनंद और मस्ती में रहते हैं और हमेशा उस ऊपर वाले का शुक्रिया अदा करते हैं।” इतना कहने के साथ ही फकीर ने राजा को आशीर्वाद दिया और महल से चला गया।

आदि ग्रंथ में पृष्ठ स 757 पर गुरु रामदास जी फरमाते हैं:
जे सुख देहि त तुझहि अराधी दुख भी तुझे धियाई। जे भुख देहि त इत ही राजा दुख विच सुख मनाई…

Published by Pradeep Th

अनमोल मनुष्य जन्म और आध्यात्मिकता

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