
ग्रंथो शास्त्रों में सुबह सवेरे यानी रात के पिछले पहर को अमृत वेला, ब्रह्म मुहूर्त, ब्रह्म घड़ी आदि कहा गया है। परमेश्वर के भक्तों ने अमृत वेला को भक्ति के लिए खास तौर से लाभदायक माना है।
सुबह का वातावरण भक्ति के लिए बहुत उत्तम होता है। सबह के समय रात भर सोने के बाद शरीर तरोताजा होता है। रात का खाना हजम जो चुका होता है और नींद का भी जोर नहीं होता। पिछले दिन के सारे झगड़े झमेले भूल चुके होते है। में दुनिया में नहीं फैला होता। घर के बाहर लोगो का आना जाना नहीं होता। वातावरण शांत और रूहानियत की निर्मल तरंगों से भरा होता है जिसमें जीव भजन करके अधिक लाभ प्राप्त कर सकता है।
आदि ग्रंथ में पृष्ठ स 1099 पर गुरु अर्जुन देव जी फरमाते है :
परभाते प्रभ नाम जप गुर के चरण धियाई।
जनम मरण मल उतरे सच्चे के गुण गाई।।
अमृत वेला में प्रभु का नाम जपना चाहिए। नाम का जाप ही सच्ची गुरु भक्ति है और यही सच्ची प्रभु भक्ति है। इस भक्ति द्वारा ही जीव जन्म मरण के बंधन तोड़कर निज घर वापस पहुंच सकता है। जिस प्रकार भली भांति तैयार की गई धरती में समय पर बोया गया बीज जल्दी अंकुरित होता है, उसी तरह अमृत वेला में किया गया नाम का सिमरन जल्दी फलीभूत होता है। अमृत वेला में नाम का सिमरन करने से भक्ति का ऐसा ख़ज़ाना जमा हो जाता है, जिसमें कमी नहीं आती।
अमृत वेला में नाम जपने का यह अर्थ नहीं है कि कोई और समय नाम जपने के लिए ठीक नहीं है।
आदि ग्रंथ में पृष्ठ स ५६५ गुरु अमर दास जी की वाणी है: सच वेला मूरत सच, जित सच्चे नाल पियार।।
आदि ग्रंथ में पृष्ठ स ११५ गुरु अमर दास जी की वाणी है: वेला वखत सभ सुहाईया।। जित सचा मेरे मन भाया।।
वह घड़ी, पल, मुहूर्त और समय धन्य है जिसमें उस प्यारे प्रीतम की याद आए। सब दिन, महीने, मूहर्त परमात्मा के बनाए हुए है। उसका बनाया हुआ हर पल पवित्र है। उसकी कृपा से जिस समय भी ध्यान नाम कि कमाई की तरफ जाए, वह समय धन्य है।
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