
संत महात्मा हमे बताते है कि हमारी हस्ती का आधार मन इन्द्रियां या शरीर नहीं, आत्मा है। मन, इन्द्रियां जड़ और नाशवान है, पर आत्मा उस कर्ता पुरुष का अंश होने के कारण उसकी तरह ही चेतन, अमर, अविनाशी और अजन्मी है। कह कबीर इहू राम की अंस । ( कबीर साहिब, आदि ग्रंथ पृष्ठ स 871) असल में आत्मा, परमात्मा की तरह शक्ति रूप, ज्ञान रूप और आनंद रूप है। परमात्मा की अंश है।
भागवत गीता में (2:23) : इसे न तलवार काट सकती है, न आग जला सकती है और न ही पानी इसे गला सकता है।
यह असल में सहज आनंद और पूर्ण ज्ञान के अजर और अमर धाम सतलोक की रहने वाली है। स्वामी जी महाराज (14:2:2) पुरुष अंस तू सतपुर बासी । यह इस्त्री पुरुष, बच्चे बूढ़े, काले गोरे, हिन्दू मुसलमान, अमरीकन अफ्रीकन के भेद – भाव से ऊपर है।
जिस प्रकार ठंडे देश के निवासी को उस देश के वातावरण के अनुसार और अंतरिक्ष में जाने वाले यात्री को अंतरिक्ष के वातावरण के अनुसार कपड़े पहनने पड़ते है, उसी तरह, आत्मा अपने असल रूप में इस मायावी जगत में नहीं रह सकती है और न ही यह जगत निर्मल आत्मा के तेज प्रकाश को सहन कर सकता है। इसीलिए आत्मा को काल और माया के इस संसार में रहने के लिए अपने ऊपर मायावी पर्दे डालने पड़ते है।
वर्तमान अवस्था में आत्मा स्थूल, सूक्ष्म और कारण तीन प्रकार के पर्दों (शरीरों) में लिपटी हुई है और इन तीनो में पिंडी, अंडी और ब्रह्माण्डी मन काम कर रहा है। जब तक आत्मा मन और इन्द्रियों का साथ नहीं लेती, यह पूर्ण रूप से शुद्ध आत्मा है। परन्तु जब मन और इन्द्रियों का साथ ले लेती है तो यह जीवात्मा कहलाती है।

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Hi read this
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इस शरीर को भी प्रकृति ने जिसे ईश्वर माना जा सकता है हमारे शरीर में विभिन्न विभाग दिए हैं जिसमें से एक बुद्धिविभाग
(Brain) भी है और ये शरीर के सारे विभागों को नियंत्रित करता है।ये ना हो तो अस्तिव हमारा जड़ हो जाएगा।अतः आत्मा के अस्तिव का आभास और चिंतन भी तभी होगा जब शरीर है।सब प्रकृति रूपी ईश्वर बड़ी आश्चर्यजनक व्यवस्था से दुनिया को नियंत्रित कर रही है।
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सबसे पहले हमे यह समझ ना होगा कि हमारा शरीर या उसका कोई अंग चेतन नहीं है। वे सिर्फ जड़ है। चेतन सिर्फ आत्मा है। दूसरी बात मर जाने के बाद ऐसा क्या हो जाता है कि brain होने के बावजूद भी शरीर हिल नहीं पाता जिसे मौत कहते है।
यानी सिर्फ आत्मा के निकल जाने से ही सारा शरीर अचेतन हो जाता है।
आत्मा के अस्तित्व का आभास शरीर से नहीं बल्कि शरीर का आस्तित्व ही आत्मा है। आत्मा बिना हम शरीर को एक पल के लिए भी रख नहीं पाते । चाहे हमारा कितना ही अज़ीज़ क्यो ना हो।
हमारी पोस्ट आप शुरू से एक एक पढ़े क्योंकि हमने सिलसिले वार हर चीज को समझाया है फिर भी कोई सवाल हो तो जरूर लिख
धन्यवाद
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आत्मा का एहसास होता है तब तक जब तक हमारा चिन्तन सक्रिय है चिंतन हमारी बुद्धि से होता है। ये बुद्धि प्रकृति की देन है जिसका स्तर प्रकृति अनुसार विभिन्न स्तर रखता है। यदि एक व्यक्ति की मौत होती है तो दूसरे व्यक्ति जो उसके आस पास होते हैं वे क्रिया कर्म करते है। यदि आत्मा है तो शरीर भी उसका पूरक है। हमने मकान में रहने वाले लोगों को साक्षात देखा लेकिन यदि शरीर को मकान कहा और उसमें आत्मा रहती है कहा तो आत्मा नही देख पाए बुद्धि ने उसका एहसास कराने की कोशिश की है।इसीलिए बुद्धि (ब्रेन) भी बलशाली है। मौत होने के बाद उसका अंश प्रकृति में मिल जाता है। प्रकृति बहुत बड़ी चित्रकार वैज्ञानिक चिकिसक इंजीनियर आदि आदि है।जिसका पार पाना मुश्किल है।
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प्रदीप आपसे चर्चा करना आनंद दाई है ।🙏🎉
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धन्यवाद
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जहा विज्ञान की हदे समाप्त होती है वहां आद्यात्म की तरह सिर्फ शुरुवात है। इसीलिए बुद्धि को अलग रखेगे तो ही आद्यात्म की बात समझ सकते है जी।
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यह करनी का भेद है, नाही बुद्धि विचार।
बुद्धि छोड़ करनी करो, तो पावो कुछ सार।।
(स्वामी जी, सारबचन छंद बंद, २४:१:१४८)
आद्यात्म सिर्फ करनी करने का विषय है ना कि बुद्धि का, जब बुद्धि को अलग रखकर करनी में लगेंगे तब ही कुछ सार यानी परमात्मा का पता चलेगा।
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