पिंड के छः चक्रों की साधना, योग – अभ्यास, कुण्डलिनी जगाने, प्राणायाम आदि द्वारा अभ्यासी को ऋद्दिया सिध्दियां और करामाते हासिल हो जाती है, जिनसे वह अलौकिक कार्य भी कर सकता है। संत महात्मा समझाते है कि ऋद्दिया सिध्दियां और करामाते मन माया का खेल है। यह काल द्वारा आत्मा को संसार में फसाए रखने के लिए बुना महाजाल है। ऋद्दिया सिध्दियो का विशुद्ध रूहानियत से कोई सम्बन्ध नहीं है।
आदि ग्रंथ पृष्ठ स ६ गुरु नानक साहिब कहते है: आप नाथ नाथी सभ जा की रिधि सिद्धि अवरा साद।। यानी ऋद्दिया सिध्दियां उस कुल मालिक के मालिक से मिलानेवाले आनंद का मुकाबला नहीं कर सकतीं।।
संतो का असल ध्येय करामाते दिखाना नहीं होता। संत परमात्मा का रूप होते है। वे कुछ भी कर सकते है, लेकिन वे जब तक देह में रहते है, अपने आपको छिपाकर रखते है। वे परमात्मा के दास बनकर रहने में खुशी महसूस करते है, उसके शामिल होने में नहीं। ऋद्दि सिध्दि द्वारा किसी को कुछ देना, यह सिद्ध करना है कि देख, तुझे परमात्मा ने जो कुछ नहीं दिया था, मैने दे दिया है।
ऋद्दिया सिध्दियां सांसारिक प्राप्तियों का साधन हो सकती है, रूहानी तरक्की का नहीं। करामाते दिखाने से होमे ( अहंकार) में वृद्धि होती है, घोर तपस्या से की गई कमाई व्यर्थ चली जाती है और आगे की रूहानी तरक्की बंद हो जाती है। सच्चे परमार्थी का लक्ष्य परमात्मा से मिलाप करना होता है। ऋद्दिया सिध्दियां इस लक्ष्य की प्राप्ति में बड़ी रुकावट साबित होती है।
स्वामी जी महाराज कहते है: नाम रस पियो रहो हुशियार। ऋद्धि और सिद्धि रहे तेरे द्वार।। करो मत उनको अंगीकार। वहां से आगे धरो पि़यार।। सारबचन संग्रह , १९:२०:१०-११
आप साधक को सावधान करते है कि नाम की कमाई से भी अलौकिक ऋद्दिया सिध्दियां प्राप्त हो जाती है, लेकिन कभी भूलकर भी इनके निकट नहीं जाना चाहिए, बल्कि नाम की कमाई द्वारा प्राप्त हुई शक्ति को और अधिक रूहानी तरक्की के लिए इस्तेमाल करना चाहिए।