
संसार में सभी संतो ने कर्मो और फल के सिद्धांत को बताया है। संतो महात्माओं ने संसार को कर्म भूमि या “करमा संदडा खेत” (गुरु नानक देव जी , आदि ग्रंथ पृष्ठ स १३४ में कहा है।)
तुलसी दास, रामचरितमानस (२:२१८:२) में उन्होंने कहा है: “करम प्रधान बिस्व कर राखा। जो जस करई सो तस फल चाखा।।” मृत्यु लोक से लेकर नर्को स्वर्गो तक और मनुष्य से लेकर देवी देवताओं तक सभी जीव कर्म और फल के कानून के अधीन बार बार पैदा होते है और मरते है और किए हुए कर्मो का फल भोगते है। नरक, घोर पाप और और स्वर्ग, श्रेष्ठ पुण्यो के भुगतान का साधन है।
आदि ग्रंथ में पृष्ठ स ४३३ पर गुरु नानक साहिब कर्म और फल के बारे में समझाते है:” ददे दोस न देऊ किसे, दोस करमा आपणिया।। जो मै किया सो मै पाईया, दोस ना दीजै अवर जना।।
परमात्मा को दोष देने के स्थान पर यह समझने का यत्न करना चाहिए कि परमात्मा ने मन मर्जी से नहीं, हमारे पहले किए हुए कर्मो के आधार पर हमारी किस्मत लिखी है। काया के बिना कर्म नहीं और कर्म के बिना काया नहीं। सुख दुख, रिश्ते नाते, अमीरी गरीबी, मान अपमान आदि सबका आधार हमारे अपने पहले किए हुए कर्म है।
भागवत पुराण में भगवान कृष्ण उधो को उपदेश करते है कि जो कीड़ा तुम सामने जाता हुआ देख रहा है, यह अपने किये हुए कर्मो के कारण कई बार ब्रम्हा और इन्द्र बन चुका है। महाभारत में आता है कि महाराज ध्रतराष्ट्र अपने एक सौ छ जन्म पहले किए हुए कर्म के कारण अंधे पैदा हुए थे।
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