
आत्मा परमात्मा की अंश है इसके अंदर अपने मूल के प्रति कुदरती कशिश है, पर इस मृत्यु लोक में कुछ ऐसी शक्तियां भी है जो जीवात्मा को रचना के प्रेम में फसाकर परमात्मा से मिलाप के रास्ते में रुकावटें पैदा करती है। इन शक्तियों को काल, मन और माया का देश कहा जाता है।
संसार परमात्मा का खेल है और काल इस खेल को जारी रखने का मुख्य साधन है। परमार्थ का यह गहरा रहस्य केवल पूर्ण संतो ने ही खोला है कि काल द्वैत, विरोध और विनाश की वह शक्ति है जो परमात्मा की मौज से संसार में कार्य कर रही है। संत महात्मा हमे समझाते है कि यह रचना भी दयाल की बनाई हुई है, काल भी दयाल का बनाया हुआ है और जिन नियमों के अनुसार यह रचना चल रही है, वह नियम भी दयाल के ही बनाए हुए है।
काल, अकालपुरूष से ही शक्ति लेकर सृष्टि की रचना करता है या यह भी कहा जा सकता है कि परमात्मा द्वारा रची गई सृष्टि पर काल का पहरा है। स्वामी जी महाराज त्रिलोकी को चौपड़ के खेल के समान बताते हुए कहते है: माया काल बिछाया जाल। अपने स्वराथ करें बेहाल।। कोई गोट न जावे घर को। यहां ही खेल खिलावे सब को।। (सारबचन संग्रह, २२:१:१७-१८)
आप कहते है कि इस खेल में एक तरफ जीवात्मा है और दूसरी तरफ काल और माया है। काल और माया ने तीन गुणों, कर्म और फल, आशा – तृष्णा और इन्द्रियों के भोगों का जाल बिछाकर जीव रूपी गोट को इसमें कैद किया हुआ है ताकि यह रचना रूपी चौपड़ को जीतकर सतलोक रूपी निज घर वापस न जा सके, क्योंकि इस तरह उनका देश सुनसान हो जाएगा।
संत हमे समझाते है कि मृत्यु लोक तो एक तरफ़, इंद्रपुरी, विष्णुपुरी और शिवपुरी पर भी काल का पहरा है। सब देवी देवता भी काल के अधीन है। इनकी पूजा और भक्ति कभी किसी को परमात्मा से नहीं मिला सकती। काल समय, परिवर्तन, मृत्यु या विनाश और कर्मो का फल देने वाली शक्ति का सूचक है। कर्मों का फल देने वाली शक्ति को काल भी कहा गया है और धर्मराज भी।
Continue…..