आत्मा अब तक काल के देश से निकलकर सतलोक नहीं जा सकी, इसका कारण कल नहीं, बल्कि हमारे खुद के किए हुए कर्म ही है। काल तो उस परमात्मा का हुक्म मानकर, रचना के नियमो के अनुसार हमारे किए हुए कर्मो का ही फल हमे दे रहा है। वह तो परमात्मा का सच्चा सेवक है को अपने मालिक कि आज्ञा का ईमानदारी से पालन कर रहा है। प्रश्न किया जा सकता है कि परमात्मा ने काल कि रचना क्यो की?
स्वामी जी महाराज ने सारबचन छंद बंध, २६: प्रश्न २:७७ में इसका उत्तर दिया है आप फरमाते है: काल रचा हम समझ बूझ के। बिना काल नहि खोफ़ जीव के।।
आप समझाते है कि उस परमात्मा ने को कुछ किया है, उसमे भेद है और जो कुछ किया है, जीव की भलाई के लिए किया है। अगर जीव को मृत्यु या किए हुए कर्मो का फल मिलने का डर न हो तो वा ठीक रास्ते पर चलने, गलत कार्यों से बचने और जीवन को मुख्य उद्देश्य की प्राप्ति के लिए इस्तेमाल करने कि कभी कोशिश नहीं करेगा।
काल न आत्मा को पैदा कर सकता है ना ही उसका विनाश का सकता हैं। वह आत्मा को केवल शरीर रूपी पिंजरे में कैद करके इस मृत्यु लोक में फसाकर रखता है। ताकि आत्मा अपने असली घर सतलोक ना जा सके। इसके लिए उसने अपने एजेंट मन को आत्मा के साथ लगाया हुआ है जो आत्मा को इन्द्रियों के घाट पर लाकर उससे तरह तरह के कर्म करवाता है और बहार्मुखी कर्मकांडो और शरीयतो में फसाकर उसे सच्ची प्रभु भक्ति की तरफ नहीं जाने देता।
आदि ग्रंथ पृष्ठ स ३८ में गुरु अमरदास जी फरमाते है: धरम राई नो हुकम है बहि सच्चा धरम विचार।। दूजे भाई दुसत आतमा अोह तेरी सरकार।।
काल का हुक्म सिर्फ उन जीवों पर ही चलता है जो परमात्मा को भुलाकर और रचना के प्रेम में खोकर यहां अनेक प्रकार के कर्मो में लगे रहते हैं।
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