
आदि ग्रंथ में दर्ज वाणी को अलग अलग रागों के अनुसार गाने की हिदायत की गई है। जब वाणी का गायन किया जाता है तो वाणी की पूरी समझ न भी आए, तब भी उस कीर्तन से मन को शांति मिलती है और ध्यान उस परमेश्वर की तरफ जाता है, जिसकी महिमा में कीर्तन किया जाता है। जिस गायन को सुनकर हमे उस सच्चे प्रीतम की याद आए और मन में उसके मिलाप की तड़प पैदा हो, वह गायन धन्य है। परन्तु हमे सच्चा परमार्थी लाभ अपने ध्यान को अंतर्मुख करके प्रभु के नाम से लिव जोड़ने से ही प्राप्त हो सकता है।
आदि ग्रंथ में पृष्ठ स ८४९ पर गुरु अमरदास जी ने चेतावनी दी है : राग नाद छोड हरि सेविए ता दरगह पाइए मान।। नानक गुरमुख ब्रहम बीचारिए चुके मन अभिमान।।
आप राग नाद की निन्दा नहीं करते, उसकी सीमा बयान कर रहे है। आप उपदेश कर रहे है कि इस गलतफहमी में नहीं रहना चाहिए कि केवल वाणी के कीर्तन या गायन द्वारा हमारा कार्य पूरा हो जाएगा। वाणी का कीर्तन शुरुवात है, अंत नहीं। आप ” हरि सेवाएं” और गुरमुख ब्रहम बीचारिए का उपदेश देते है, यानी सिर्फ राग नाद तक ही न रुके रहो, बल्कि गुरमुखो के उपदेश के अनुसार मन को हरि की भक्ति में लगाओ ताकि अहंकार को दूर करके परमेश्वर से मिलाप कर सको। गुरु साहिब सावधान करते है कि बाहर से रागी राग गा रहे होते है और लोग सुन रहे होते है, लेकिन सुनने वाले का मन कहीं ओर ही होता है। इससे लाभ की जगह हानि होती है। यह उसी तरह जिस तरह किसान कुएं से खेतों में पानी देने के लिए बैल जोतता है, पर वे उसका खेत ही चर जाए।
हर जीव के अंदर आंखो के पीछे अनहद शब्द की मीठी ध्वनियां गूंज रही है। सतगुरु की समझाई विधि के अनुसार अपना ध्यान आंखो के पीछे एकाग्र और स्थिर किया जाए तो वे ध्वनियां अंदर सुनाई देने लगती है। बाहर बाजे तो समय पाकर बंद हो जाते है और बाहर बाजे वाले भी थक जाते है , पर अंदर के राग कभी बंद नहीं होते।
हर प्रकार की दूसरी करनी का फल यमदूत लूटकर ले जाते है, पर अगर आत्मा पल भर के लिए अंदर उस निर्मल कीर्तन से जुड़ जाए तो जीवात्मा सदा के लिए जन्म मरण के बंधनों से आजाद हो जाती है।

Note: अगर आपको मेरी पोस्ट अच्छी लगे तो आप आगे फॉरवर्ड जरूर करे ताकि और लोगो को भी इसका फायदा मिले। धन्यवाद