गुरू मंत्र, नामदान या दीक्षा

संत महात्मा अपनी शरण में आए जीव को परमात्मा से मिलाप की मंजिल पर पहुंचने के लिए अंतर्मुख रूहानी अभ्यास की जो युक्ति सीखते है, उसे संत मत में नाम दान, गुरु मंत्र, गुरु उपदेश, गुरु का शब्द, गुरु का नाम, गुरु का वचन, गुरु की दीक्षा आदि नामों से जाना जाता है। इस दीक्षा,उपदेश या मंत्र का मुख्य उद्देश्य जीव की सुरत यानि आत्मा को अंदर परमात्मा का रूप नाम, शब्द,अनहद शब्द, अनहद वाणी, इस्मे आजम या बांगे इलाही से जोड़ना है। इसीलिए इसे शब्द या नाम का भेद भी कहा जाता है।

सतगुरु और शिष्य का दो तरफा सम्बन्ध है। शिष्य का किसी संत महात्मा को गुरु धारण करना और शिष्य को अपनी शरण में लेने के लिए राजी होना जरूरी है। गुरू नानक साहिब कहते है ” १ ओ सतगुरू प्रसाद” वह प्रभु सतगुरु की दया मेहर से मिलता है। रूहानी अभ्यास की युक्ति गुप्त है। गुरू स्वय शिष्य को यह युक्ति समझाता है, जिस कारण इसे गुप्त भेद, गुप्त साधन या गुप्त ज्ञान भी कहा जाता है। इसे सूफी दरवेशो ने इल्मे सीना या इल्मे लुद्न्नी का नाम दिया है।

आदि ग्रंथ में पृष्ठ स ११४० पर गुरु अर्जुन देव जी ने कहा है: बिन गुर दीखिया कैसे गियान।। बिन पेखे कहु कैसो धियान।।

आप समझाते है कि जब तक कोई कामिल मुर्शीद दया मेहर करके अपनी शरण में आए जीव की आत्मा अंतर में शब्द या नाम से नहीं जोड़ता और उसे रूहानी अभ्यास की पूर्ण विधि नहीं सीखाता, शिष्य का नाम की डोर को पकड़कर आंतरिक रूहानी मंडलों में दाखिल होना और रूहानी सफर तय करके धुर धाम पहुंच पाना कठिन ही नहीं, असंभव है। कुल मालिक ने सृष्टि के आरम्भ से जीव को पार उतरने की यह युक्ति रखी है कि कोई पूरा गुरु ही जीव को पूरा मंत्र बख्शकर उसका भवसागर से पार उतारा कर सकता है।

सतगुरु के दिए हुए नाम का सिमरन करना चाहिए। सतगुरु का बख्शा सिमरन केवल लफ़ज ही नहीं होता। इसमें सतगुरु की शक्ति और दया शामिल होती है, जिस कारण यह सिमरन शीघ्र फलदायक होता है। इस सिमरन के द्वारा मन सहज ही अंदर एकाग्र हो जाता है। सतगुरु द्वारा बख्शा गया सिमरन बंदूक में से निकली गोली के समान प्रभाव डालता है, जब कि मन मर्जी से किया गया सिमरन हाथ से फेकी गोली के समान व्यर्थ चला जाता है।

कबीर साहिब सावधान करते है: जो निगुरा सुमिरन करे, दिन में सौ सौ बार। नगर नायका सत करे, जरे कोन की लार।। ( कबीर शब्दावली संग्रह पृष्ठ स १५)

आप समझाते है कि मन मर्जी के या ग्रंथो शास्त्रों में से लिए गए किसी नाम का सिमरन सतगुरु द्वारा दिए सिमरन की जगह नहीं ले सकता।

गिने चुने भाग्यशाली जीव ही गुरु मंत्र की आराधना या नाम कि कमाई द्वारा प्रभु से मिलाप करके यह ज्ञान प्राप्त करने में सफल होते है कि संसार में केवल एक परमात्मा, उसका नाम और उसके पूर्ण संत सत्य है, बाकी सब झूठ है।

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Published by Pradeep Th

अनमोल मनुष्य जन्म और आध्यात्मिकता

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