गूंगे का गुड़

संतो महात्माओं ने अंतर में सूक्ष्म रूहानी अनुभवों, रूहानी मंडलो की स्थिति और परमात्मा से मिलाप के सहज ज्ञान और आनंद को अकथ, अकह, ला बयान कहा है। यह गूंगे का गुड़ है। जिस तरह गूंगा व्यक्ति गुड़ के स्वाद बयान नहीं कर सकता, उसी प्रकार इस सूक्ष्म अनुभव को स्थूल इन्द्रियों के स्तर पर किसी सांसारिक भाषा में बयान कर सकना असंभव है। जिस तरह बाहरी दुनिया में अमृतसर के हरमंदर साहिब और आगरा के ताजमहल की सुंदरता की तुलना किसी दूसरी चीज से नहीं की जा सकती, उसी प्रकार अंतर के सूक्ष्म आनंद की भी किसी बाहर की वस्तु या किसी बाहरी रस से तुलना नहीं की जा सकती।

कबीर साहिब जी फरमाते है: बाबा अगम अगोचर कैसा, ताते कहि समझाओ ऐसा।। जो दिसे सो तो है नाही, है सो कहा ना जाई। सैना बैना कहि समझाओ, गूंगे का गुड़ भाई।। कबीर साहिब की शब्दावली, भाग १, पृष्ठ s ७१।

आप समझा रहे है कि जो दिखाई दे रहा है, वह वास्तविक नहीं और जो वास्तविक है, वह न तो दिखाई देता है और न ही बयान किया जा सकता है। जिस तरह गूंगा व्यक्ति गुड़ की मिठास को बयान नहीं कर सकता, उसी तरह आध्यात्मिक अनुभव शब्दो मै बयान नहीं किए जा सकते।

भीखा साहिब भी यही कहते है: भीखा बात अगम की कहां सुनने में नाही। जो जाने सो कहे ना, कहे सो जाने नाही।।

आप समझाते है कि आंतरिक सूक्ष्म आध्यामिक अनुभव आम बोलने वाली भाषा में बयान नहीं किए जा सकते, जिसके अंतर में आध्यात्मिक रहस्य प्रकट हो जाते है, उसकी जुबान बंद हो जाती है। क्यो कि यहां कुछ ऐसा है ही नहीं जिससे वहां की तुलना की जा सके।

कोई भी सुहागिन पति के मिलाप और प्रेम के आनंद को शब्दो में बयान नहीं कर सकती। उसी तरह प्रभु मिलाप के परम आनन्द को भी आंतरिक आध्यात्मिक मंडलों के संबंध में कुछ कुछ इशारे ही दिए है क्योंकि उम मंडलों को शब्दो में पूरी तरह प्रकट कर सकना असंभव है। एक कहावत है ” जिन हरि पाया तिन ही छिपाया”

महात्मा समझाते है कि अपनी आध्यात्मिक अवस्था को छिपाकर रखना जरूरी है, क्योंकि संसार में कोई इसका सच्चा कद्रदान नहीं है। जिसके पास हीरा होता है, उसे छिपाकर रखता है, उसकी नुमाइश नहीं करता। आंतरिक अनुभव अभ्यासी की निजी जायदाद होती है। उनका प्रयोग केवल और ज्यादा से ज्यादा आध्यात्मिक तरक्की के लिए ही किया जाना चाहिए।

अपने अनुभव बयान करने से अहंकार बड़ जाता है, झूठा सांसारिक मान सम्मान मिल जाता है, और तो और कठिन परिश्रम और कुल मालिक की अपार दया से प्राप्त हुई अमूल्य आध्यात्मिक पूंजी कोड़ियो के मोल नष्ट हो जाती है।

आदि ग्रंथ में पृष्ठ स ६३५ पर गुरु नानक देव जी फरमाते है: जिन चाखिया सेई साद जाननी, जिउ गूंगे मिठीआई ।। अकथे का कि आ कथिए भाई, चलाऊ सदा रजाई।।

साईं बुल्लेशाह फरमाते है: आशिक फिरदे चुप चु पाते, जैसे मस्त सदा मध माते। (कुल्लीयत बुल्लेशाह, काफी १४३)

कबीर साखी संग्रह पृष्ठ स ११३ पर कबीर साहिब फरमाते है: जो देखे सो कहे नहि, कहे सो देखे नाहीं।।

कबीर साखी संग्रह पृष्ठ स ८३ पर कबीर साहिब फरमाते है: नाम रतन धन पाई के, गाठ बांध ना खोल। नाही पटन नहि पारखी, नहि गाहक नहि मोल।।

Note: अगर आपको मेरी पोस्ट अच्छी लगे तो आप आगे फॉरवर्ड जरूर करे ताकि और लोगो को भी इसका फायदा मिले। धन्यवाद

Published by Pradeep Th

अनमोल मनुष्य जन्म और आध्यात्मिकता

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