
चिन्ता सर्वव्यापक रोग है। सारा संसार चिंतारूपी आग में जल रहा है। गुरू नानक देव जी कहते है” चिंतत ही दिसे सभ कोई।।” (आदि ग्रंथ पृष्ठ स ९३२)
गुरु अर्जुन देव जी कहते है ” जिस गृह बहुत तिसे गृह चिंता।। जिस गृह थोरी सु फिरे भ्रमंता।। (आदि ग्रंथ पृष्ठ स १०१९) किसी को पैसा कमाने की चिंता, किसी को संतान न होने की कोशिश चिंता है, तो कोई संतान के कारण अनेक प्रकार की चिंताओं से ग्रस्त है। किसी को लड़कियों की शादी की चिंता है, तो कोई विधवा बहु की चिंता से परेशान है। व्यापारी व्यापार से, किसान खेत से और विद्यार्थी पढ़ाई से संबंधित चिंताओं से परेशान है। जिन्हे ऊची पदविया नहीं मिलती, वे तो चिंतित है है लेकिन जिन्हे ये पदवियां मिल जाती है, वे भी अनेक प्रकार की चिंताओं में ग्रस्त है। अमीर गरीब, अनपढ़ विद्वान, औरत मर्द, बच्चा बूढ़ा सब चिंता का शिकार है।
हम चिंता क्यो करते है? चिन्ता के पीछे यह डर छिपा रहता है कि कोई अनहोनी या अप्रिय बात न हो जाए-। ऐसा ना ही जाए , वैसा ना हो जाए। यह डर अज्ञानता और अविश्वास में से जन्म लेता है। अगर मन को यह विश्वास हो जाए कि परमेश्वर द्वारा रचित संसार में कभी कुछ ग़लत नहीं हो सकता, तब हम चिंता किस बात की कर सकते है? इसी प्रकार अगर मन में यह विश्वास हो जाए कि संसार में जो कुछ हो रहा है, कर्म और फल के नियम के अनुसार हो रहा है और कभी कुछ भी अकारण नहीं हो सकता, तब ही हम निश्चिंत हो पाते है।
चिन्ता हमारा कुछ बना नहीं सकती, पर बिगाड़ बहुत कुछ सकती है। चिन्ता दीमक की तरह अंदर ही अंदर जीव को खाती रहती है। चिन्ता ग्रस्त व्यक्ति न सांसारिक कार्य पूरी शक्ति से कर सकता है न ही परमार्थ में तरक्की कर सकता है। चिन्ता स्वय द्वारा लगाया गया रोग है। हमे कुलमालिक में पूर्ण विश्वास रखते हुए साहस, निडरता और दृढ़ता से स्वार्थ और परमार्थ दोनों में आगे बढ़ने का प्रयास करना चाहिए।
गुरू तेग बहादुर साहिब हमको सावधान करते हुए कहते है: चिंता ता की कीजिए जो अनहोनी होई।। इहु मारग संसार को नानक थिर नहीं कोई।। (आदि ग्रंथ पृष्ठ स ९३२) आप कहते है कि चिंता तभी करनी चाहिए जब कोई अनहोनी बात हो सकती हो। परिवर्तन संसार का नियम है और संयोग और वियोग के नियम के अनुसार ही चल रहा है। कर्म और फल का अटल नियम है। इसीलिए चिंता में डूबे रहने की बजाय कुल मालिक का हुक्म मानते हुए हर हाल में खुश रहना चाहिए।
कबीर साहिब कहते है: सुभ और असुभ करम पुरबले, रती घटे न बढ़े। होनहार होवे पुन सोई, चिंता काहे करें।। (कबीर साहिब की शब्दावली , भाग २ पृष्ठ स १)

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