दरद न जाने कोय

मीरा बाई का शब्द

  • हेरी मै तो प्रेम दीवानी, मेरो दरद न जाने कोय।
  • सूली ऊपर सेज हमारी, किस बिध सोना होय।
  • गगन मंडल में सेज पिया की, किस विध मिलना होय।
  • घायल की घायल जानें, की जिन लाई होय।
  • जौहर की गति जौहर जाने, की जिन जौहर होय।
  • दरद की मारी बन बन डोलू बेद मिला नहीं कोय।
  • मीरा की प्रभु पीर मिटेगी, जब बैद सावलिया होय

मीरा बाई अपने प्रियतम के वियोग में व्याकुल है। अपनी विरह व्यथा में उन्हें ऐसा महसूस होता है मानो उनकी सेज सूली पर बिछी हुई है। जिसकी वजह से उन्हें न नींद आती है और न ही चेन मिलता है। प्रियतम प्रभु से मिलाप प्राप्त करना भी उन्हें असंभव सा लगता है, क्योंकि उनका वास तो आंखो के केंद्र से ऊपर सूक्ष्म मंडलों में है और जहा वे पहुंच नहीं पा रही है। वे कहती है कि घायल की पीड़ा कोई घायल ही जान सकता है। या फिर वही जान सकता है जिसने चोट लगाई है, क्योंकि उस पता है कि उसने कितना गहरा आघात किया है। जौहर करने वाली औरत के प्रेम, उत्साह और जोश को वही औरत जान सकती है जिसे जौहर द्वारा पाने प्राणों की आहुति देकर दूसरे लोक में अपने प्यारे पति से मिलाप की उत्कंठा हो। पद के अंत में मीरा बाई कहती है कि उनकी वियोग की पीड़ा का उपचार सिवाय प्रियतम प्रभु के और कोई नहीं कर सकता।

Published by Pradeep Th

अनमोल मनुष्य जन्म और आध्यात्मिकता

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