
संतो महात्माओं ने हमेशा से एकता का उपदेश दिया है। वे हमको हर प्रकार के द्वैत से ऊपर उठकर समदर्शी बनने का उपदेश देते है। संत महात्मा समझाते है कि परमात्मा ने सब इंसान एक जैसे बनाए है। मजहब, मुल्क, कोम, नस्ल और जाति पाति के सब तरह के भेद भाव इंसान के बनाए हुए है। कबीर साहिब कहते है (आदि ग्रंथ पृष्ठ स 1349)
- अवल अलह नूर उपाईया कुदरत के सभ बंदे।।
- एक नूर ते सभ जग उपजिया कौन भले को मंदे।।
सबसे पहले परमात्मा ने रोशनी पैदा की, तब उसी रोशनी या उसकी रचनात्मक शक्ति द्वारा, उन्होंने सभी नश्वर प्राणियों को बनाया। उसी एक नूर या रोशनी से, पूरे ब्रह्मांड का विकास हुआ। यानि सारे प्राणी उसी ने बनाए है, तो फिर बला कोन अच्छा? और कौन बुरा हो सकता है उसकी नजर में?
जिन पांच तत्वों से मनुष्य शरीर बना है, वे भी समान है। हर मनुष्य में आंख, कान, हाथ, पांव आदि भी समान है और उनके अंदर रखा गया प्रभु का प्रकाश भी समान है इसीलिए सब इंसान बराबर है।
मजहब, मुल्क, कोम, नस्ल और जाति पाति के सब भेद अज्ञानता की उपज है। जो लोग अपने धर्म या जाति को बड़ा समझते है, अज्ञानता के अंधकार में फसे हुए है। जो दुसरो को जाति और धर्म के नाम पर छोटा समझते है, वे स्वय ज्ञान और प्रेम में छोटे है। वास्तव में जीव की जाति उसके कर्मो के अनुसार होती है। जाति उन लोगो की ही छोटी है, जो सच्चे शब्द या नाम की कमाई नहीं करते और द्वैत भाव तथा विषय विकारों में लिप्त है। अगर हम अपने चारो ओर नजर डाले तो हमे पता चलेगा कि पापी और गुनहगार हर धर्म में है। इसी तरह नेक इनसान भी सभी धर्मो में है। जिन जातियों को हम अज्ञानता वश छोटा समझते है, उनमें भी नेक रहनी, निर्मल आचरण और पवित्र विचारो वाले अनेक लोग है और जिन जातियों को हम अज्ञानता के कारण ऊंचा समझते है, उनमें भी पापियों, अत्याचारियों और बेईमानों की कोई कमी नहीं है।
पलटू साहिब की बानी, भाग -१ कुण्डली २१८
- पलटू ऊची जाति को जो कोई करे हंकार।
- साहिब के दरबार में केवल भक्ति पियार।।
संत महात्मा समझाते है कि कुल मालिक की दरगाह में जहां हमारे का हिसाब मांगा जाता है, वहां हमारा शरीर और जाति पाति साथ नहीं जाते। इसीलिए हमे ऊंची जाति, पदवी या कुल का अभिमान नहीं करना चाहिए और न ही किसी को नीची जाति का समझकर उसके साथ घृणा करनी चाहिए। कोई व्यक्ति केवल इसीलिए परमेश्वर की प्राप्ति का अधिकारी नहीं बन जाता कि उसका जन्म ऊंची जाति में हुआ है और न ही कोई जीव केवल इसीलिए प्रभु की भक्ति से वंचित रह जाएगा कि उसने नीची जाति में जन्म लिया है। जब उस परमात्मा की कोई जाति नहीं तो हमारी आत्मा, जो परमात्मा की अंश है, उसकी क्या जाति पाति हो सकती है? जीव को सच्ची महानता भक्ति, नाम की कमाई और शुभ कर्मो के कारण मिलती है, जाति पाति के कारण नहीं। तुलसी साहिब फरमाते है: (संत बानी संग्रह, भाग, पृष्ठ स २३५)
- नींच नीच सब तर गए, संत चरन लोलिन।
- जातह के अभिमान से, डूबे बहुत कुलीन।।
आप इशारा करते है कि परमात्मा से मिलाप का सौभाग्य केवल उन्हीं जीवों को प्राप्त होता है जो जाति पाति के भेदभाव से ऊपर उठकर, सतगुरू की बताई युक्ति के अनुसार शब्द या नाम की कमाई करते है।
