
संत महात्मा प्रभु की प्राप्ति के लिए मन की निर्मलता का उपदेश देते है। हम इसके लिए आसान से आसान साधन ढूंढने की कोशिश करते है। हम समझते है कि तीर्थो में स्नान करने से मन निर्मल हो जाएगा और हम प्रभु मिलाप करने में सफल हो जायेगे। पर ऐसा सोचना ठीक नहीं है।
तीर्थ स्थान कैसे बने? प्राचीन काल में प्रभु के भक्त नदियों के नजदीक कोई जगह प्रभु भक्ति के लिए चुनते थे ताकि स्नान आदि में आसानी हो। संत महात्मा अपना आश्रम बनाते समय इस बात का विशेष ध्यान रखते थे कि उनके पास आनेवाले जिज्ञासुओं को पानी की कोई दिक्कत न हो। यह पानी प्यास बुझाने और शरीर की सफाई के लिए था ताकि जिज्ञासु सुचेत होकर सत्संग सुन सके और नाम का अभ्यास कर सके। नाम का अभ्यास करने वाले और नाम का उपदेश देनेवाले महात्माओं के बाद लोगो ने इन स्थानों को तीर्थ बना लिया और इनमे स्नान करने को ही प्रभु भक्ति या मन की निर्मलता का साधन समझना शुरू कर दिया। हम प्रभु भक्ति या में की निर्मलता का आसान से आसान तरीका ढूंढते है। मन को विषय विकारों में मोड़कर नाम कि कमाई द्वारा निर्मल करना कठिन कार्य है। इसीलिए हम लोग अज्ञानतावश तीर्थ यात्रा को मन की निर्मलता का साधन समझना शुरू कर देते है।
संत महात्मा समझाते है कि बाहरी तीर्थ शरीर की मैल उतार सकते है, लेकिन मन और आत्मा पर चढ़ी कर्मो और संस्कारों की मलीनता को दूर करने वाला सच्चा तीर्थ हमारे अपने अंतर में है।
कबीर साहिब फरमाते है (आदि ग्रंथ पृष्ठ स ४८४)
- अंतर मैल जे तीरथ नावे, तिस बेंकुट न जाना।।
- लोक पतिने कछु न होवे, नाही राम अयाना।।
- एक और जगह लिखते है…
- जल कै मजनि जे गति होवे नित नित मेंढक नावह।।
- जैसे मेंढक तैसे अोई नर फिर फिर जोनि आवह।।
अंतर में मैल है और हम तीर्थ नहाहे, इससे हम कभी परमात्मा से मिल नहीं सकते। एक सुंदर उदाहरण के ज़रिए आप समझाते है कि अगर जल में नहाने मात्र से गति प्राप्त होती तो सबसे पहले उस मेंढक को गति प्राप्त होती जो रोज रोज उस जल में नहाता है। पर असल में जैसे मेंढक को बार बार जन्म लेकर चौरासी के चक्कर लगाने है वैसे ही हमारा हाल है।
संत महात्मा तीर्थो का विरोध नहीं करते। वे इनकी सीमा बयान करते है। वे समझाते है की अगर हम तीर्थ स्थान को ही प्रभु भक्ति और नाम की कमाई मान लेंगे तो हम अपने परमार्थी लक्ष्य में कभी सफल नहीं हो सकते। बाहरी कर्मकाण्ड और हर प्रकार के दूसरे साधन हमारे अंदर सच्ची प्रभु भक्ति का शौक पैदा करने के लिए है। पर यदि हम तीर्थो पर जाकर संतो महात्माओं के निर्मल वचन सुने, अपना जीवन उनके उपदेशानुसार ढालने का प्रयत्न करे और पूर्ण संतो से अंतर्मुख अभ्यास की युक्ति सीखकर नाम के अंतर्मुख सच्चे तीर्थ में स्नान करे, तो हमारी बाहर की तीर्थ यात्रा भी सफल हो जाएगी।