
हर मंदर एह सरीर है, गियान रतन प्रगट होई।। (आदि ग्रंथ पृष्ठ स 1346)
हमारा शरीर ही मालिक के रहने का असली हरि मंदिर है और उस मालिक का असली ज्ञान उसी के अंदर से प्राप्त हो सकता है
तुलसी साहिब हाथरस वाले फरमाते है (संत बानी पृष्ठ स ४४)
नकली मंदिर मस्जिदों में जाय सद अफ़सोस है।
कुदरती मस्जिद का साकिन दुख उठाने के लिए।।
जो हमने परमात्मा के रहने के स्थान बनाए है, कितना अफ़सोस है कि हम उन स्थानों में जाकर दिन रात उस परमात्मा को खोज रहे है और जिस मस्जिद यानी शरीर के अंदर वह परमात्मा रहता है, वह शरीर उस मालिक की याद में दिन रात दुख उठा रहा है। अगर कोई सच्चा गुरुद्वारा, मंदिर, मस्जिद या गिरजा है , वह केवल हमारा अपना शरीर है। यह जगह परमात्मा ने अपने रहने के लिए बनाई है और इसके अंदर वह खुद रहता है।
कबीर साहिब ने तो बड़े जोरदार लफ़जो में हमारे ख्याल को इस वहम और भ्रम से निकलने की कोशिश की है। आप समझाते है:
काकर पाथर जोड़ी के, मस्जिद लई चुनाय।
ता चढ़ी मुल्ला बांग दे, क्या बहिरा हुआ खुदाय।।
मुल्ला चढ़ी किलकारियां, अलख न बहीरा होय।
जेहि कारण तू बांग दे, सो दिलही अंदर जोय।।
तुर्क मसिते हिन्दू देहरे, आप आप को धाय।
अलख पुरष घट भीतरे, ता का द्वार ना पाय।।
हम पत्थर और इटे इकट्ठी करके मस्जिद य मालिक के रहने की जगह बना लेते है और उसके ऊपर चढ़कर मौलवी ऊची ऊंची बांग देकर परमात्मा को पुकारता है, जैसे परमात्मा बहरा है और हमारी आवाज उस तक नहीं पहुंच सकती। आप समझाते है कि ऐ मुल्ला! वह खुदा बहरा नहीं है। जिस खुदा के लिए तू इतने जोर जोर से चिल्ला रहा है, वह तो तेरे अंदर ही मौजूद है। मुसलमान उस खुदा को मस्जिद के अंदर ढूंढ़ रहे है। हिन्दू मंदिरो में उस परमात्मा की तलाश कर रहे है। सिक्ख और ईसाई गुरुद्वारों और गिरजा में जाकर खोज रहे है। लेकिन अलख पुरुष तो उनके अपने शरीर के अंदर ही है और अंदर ही मिलेगा।
ढूंढे उनको तो ढूंढे कहा
ढूंढे लोग बाहर यहां
कहते ध्यान में दीखते सदा
कोंन ध्यान आज लगाए कहा।।
दिखते हैं वो दर्द में सदा
आज दर्द है कहा
हर तरफ हैं खुशिया
खुशिया अहंकार की फेली यहां।।
कहते है वो दिखते है
दिखते मुस्कराहट में सदा
आज कितने मुसकाते दिल से
दिल की मुस्काने आज है कहा।।
बन्द आँखों से दिखते नही
ना खुली आँखों से दिखे यहां
देखने वाले आज भी देखें
मन की आँखों से देखे यहां।।
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