गुरु और गोविंद एक ही है
संत दादू दयाल जी फरमाते है:
जहां राम तह संत जन, जह साधू तह राम।
दादू दून्यू एकठे, अरस परस बिश्राम।।
सच्चे संत परमात्मा में मिलकर परमात्मा रूप हो चुके होते है। अतः परमात्मा कि प्राप्ति संतो द्वारा है हो सकती है और संत परमात्मा की कृपा से ही मिलते है। स्वय भगवान का यह कहना है कि जिस तरह दूध में मिलकर पानी और जल में मिलकर नमक एकाकार हो जाते है, उसी तरह भगवान के प्रेम में डूबा हुआ सच्चा भक्त भगवान बन जाता है।
अनंत सुख सागर के निवासी, नाम के रंग में सरोबार, हंस स्वरूप महात्मा दयावश केवल परोपकार के लिए इस संसार में आते है।
“साधू संगति हरि मिले, हरि संगत थे साध।।”
गुरु गोविन्द दोऊ खड़े, काके लागूं पाय।।
बलिहारी गुरु आपने, जिन गोबिंद दियो दिखाय।।