
गुरु अर्जुन देव जी (आदि ग्रंथ पृष्ठ स ३१५) फरमाते है:
अवखध सभे कितीअन, निंदक का दारू नाहि ।।
सब किए की माफ़ी है पर निंदा रूपी अपराध की माफ़ी बहुत मुश्किल है। संत मत में रूहानी तरक्की के लिए अवगुणों का त्याग करने और गुणों को धारण करने का उपदेश दिया जाता है। परमार्थी के जीवन का उद्देश्य दुनियादारी से अलग है। इस आदर्श की प्राप्ति के लिए उसकी सोच, रहनी और करनी भी दुनियादारी से अलग होनी चाहिए। संत महात्मा सच्चे परमार्थी को निंदा के अवगुण का त्याग करने का उपदेश देते है क्योंकि यह रूहानी तरक्की के रास्ते में बहुत बड़ी रुकावट है।
निंदा के पीछे अहंकार का भाव छिपा होता है। जिसकी हम निंदा करते है, उसे हम बुरा या छोटा समझते है और अपने आपको अच्छा या बड़ा समझते है। संत महात्मा हमे अपना दृष्टिकोण सुधारने की हिदायत करते है। वे समझाते है कि सबको पैदा भी एक ही परमात्मा ने किया है और सबके अंदर उस एक का ही निवास है, इसीलिए रूहानी दृष्टि से कोई भी बुरा नहीं है और किसी को बुरा कहना, प्रभु को बुरा कहना है। यही कारण है कि संतो महात्माओं ने निंदा को घोर पाप कहा है। उनका असल भाव यह है कि अहंकार सबसे बड़ा अवगुण है। निंदा का जन्म अहंकार से होता है इसीलिए निंदा बहुत बड़ा दोष है।
निंदा करने वाला हमारे लिए फायदा करते है जिसको अन्य संतो ने भी बताया है
कबीर साहेब (कबीर साखी संग्रह पृष्ठ स १६०)
निंदक दूर न कीजिए, दीजे आदर मान।
निर्मल तन मन सब करे, बके आनही आन।।
मीरा बाई जी ने (मीरा सुधा सिंधु, पृष्ठ स २९५)
निंदा म्हारी भले करजो, लेसी पलो बिछाय।।
बिना साबुन और पानी के सबही मेल धुल जाय।।