पाठ आध्यात्म की नजर से

अक्सर देखने को मिलता है कि साधारण व्यक्ति ही नहीं, ग्रंथो शास्त्रों के ज्ञाता, महान विद्वान और प्रवक्ता भी इन शास्त्रों की खूब जोर शोर से व्याख्या करते है, परन्तु उनका अपना जीवन शास्त्रों में दिए उपदेश से बिल्कुल उलट होता है। संतो महात्माओं ने इस प्रकार के पाठ विचार करने वालों को चंड़ुल पक्षी कहा है, जो जिसकी बोली सुनता है उसकी नकल कर लेता है, लेकिन उससे उसकी अपनी अवस्था में कोई अंतर नहीं आता। जब तक हम सोच समझकर पाठ नहीं करते और ग्रंथो शास्त्रों में दिए गए उपदेश के अनुसार अपने जीवन को नहीं ढालते, न तो हमारी अज्ञानता का नाश हो सकता है और न ही हमे कोई परमार्थी लाभ प्राप्त हो सकता है। धर्म ग्रंथो में से इनकी रचना करनेवाले महात्माओं के रूहानी अनुभवों का वर्णन है। हमे इनके पाठ का तभी लाभ है जब हम भी अंतर में रूहानी चढ़ाई द्वारा वही अनुभव प्राप्त करे।

गुरु अर्जुन देव जी कहते हैं

जो प्राणी गोविंद धिआवे।।

पड़िया अनपड़िया परम गति पावे।।

यदि एक व्यक्ति बिल्कुल अनपढ़ है और उसने कभी संसार के किसी ग्रंथ शास्त्र का नाम भी नहीं सुना, लेकिन अगर वह अपने अंदर अनहद शब्द को सुनता है, तो वह संसार का सबसे उत्तम पाठी और विद्वान है।

कबीर साहिब कहते है

पोथी किताबे बाचता, औरो को नित समझवता।

त्रिकुटी महल खोजे नहीं, बक बक मरा तो क्या हुआ।।

आप समझाते है कि असल फायदा धर्म ग्रंथो के पाठ से नहीं, रूहानी अभ्यास द्वारा आत्मा को ऊंचे रूहानी मंडलों में ले जाने से होता है।

Published by Pradeep Th

अनमोल मनुष्य जन्म और आध्यात्मिकता

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