
स्वामी विवेकानंद ने कहा है: “संसार का सबसे महान विजेता भी जब अपने मन को वश में करने की कोशिश करता है तो अपने आप को एक बच्चे की तरह असमर्थ पाता है। उसे इस मन रूपी संसार पर विजय प्राप्त करनी है – जो इस संसार से बड़ा है तथा जिसे जीतना और भी मुश्किल है।”
संत महात्मा जान बूझकर ऐसे उदाहरण देते है जो हमे गफलत की नींद से जगाते है, हमे झ्टका देते है, हमे चोक्कने होकर गहराई से सोच विचार करने पर मजबूर करते है। जब फकीर और दरवेश भी, जो कुछ हद तक रूहानी तरक्की कर चुके होते है, कमजोरियों का शिकार हो जाते है तो फिर हमारी क्या बिसात है? हमने तो अभी रूहानियत की पहली सीढी पर भी पाव नहीं रखा है। रूहानी तरक्की न होने के कारण हम बहुत कमजोर हो गए है क्योंकि हम मेडिटेशन द्वारा अपना बचाव नहीं कर सकते। जरा सोचो! हम कितने कमजोर है और हमारा मन कितना खतरनाक है!
एक कहावत है: ” गुरु केवल मार्गदर्शक ही नहीं है। गुरु आग कि तरह है जिसमें से हमे गुजरना है ताकि हमारे अंदर की सब अशुद्धियां जल जाए, खालिस सोना निकल आए।” (Based on Osho, Hari Om tat sat: The Divine sound-that is the thuth; Cologne: Renal Publishing house, 1989,p.64)
रूहानी मार्ग पर चलने का मतलब है – निर्मल होना, पूरी तरह पिस जाना अपने अहंकार को मिटाना और अपने अंदर बदलाव लाना। यह सफर कठिनाइयों से भरा है, मुश्किल है। सतगुरु का मकसद है सारी मलीनता दूर करके शुद्ध सोना बनाकर, अपने शिष्यों को निज घर वापस ले जाना। हमे मेडिटेशन द्वारा मन को काबू करके इसे अंतर्मुख करने की जरूरत है ताकि हम सारी मलीनताओ को जलाकर मन को साफ़ और निर्मल कर सके।
श्री राम कृष्ण परमहंस ने कहा है: ” जिस तरह सरसो के दाने जब किसी फटे लिफाफे में से निकलकर इधर उधर बिखर जाते है तब उन्हें इकट्ठा करना मुश्किल होता है, उसी तरह मनुष्य का मन जब कई दिशाओं में भागता है और कई दुनियावी बातो में उलझा रहता है, तब इसे एकाग्र करके टिकाना कोई आसान काम नहीं है।”