
कबीर साहिब इस बारे में फरमाते है:(आदि ग्रंथ पृष्ठ स 1365)
कबीर जिस मरने ते जग डरे मेरे मन आनंद।।
गुरु नानक देव जी(आदि ग्रंथ पृष्ठ स 730) फरमाते है:
नानक जीवतिया मर रहीए ऐसा जोग कमाइए।।
बाइबल में सेंट पाल (बाइबल 15:31) भी कहते है “मै प्रतिदिन मरता हूं।“
अहले इस्लाम की हदीस (अहिदिसे मसनवी हदीस 352) भी कहती है
“मूतू कबल अन तमूतू।”यानि मौत से पहले मरो
प्रसिद्ध महात्मा दादू साहिब ( दादू दयाल की बानी, भाग -1 पृष्ठ स 191) अपनी वाणी में फरमाते है
जीवत माटी है रहें साई सनमुख होई।
दादू पहिली मर रहे पीछे तो सब कोई।।
गुरु अमरदास जी फरमाते है(आदि ग्रंथ पृष्ठ स 116)
सतगुरु सेवे ता मल जाय।।
जीवत मरे हर सिउ चित लाए।।
हर मजहब के संतो महात्माओं ने अपने अपने समय और बाणियो में एक ही बात को अलग अलग तरीके से समझाया है कि परमात्मा की प्राप्ति के लिए हमे जीते जी मरना पड़ेगा। यानि जब हम अपने शरीर के नौ द्वारो में से ख्याल निकालकर आंखो के पीछे एकाग्र करते है जिससे हम हमारी चेतन शक्ति को पूरे शरीर से निकालकर आंखो में मध्य इकट्ठी हो जाती है तो पूरा शरीर सुन्न हो जाता है, संतो ने इसे है जीते जी मरना कहा है। इस युक्ति से हम अपने असली घर के दरवाजे पर आ जाते है। हमारा असली घर सचखंड है जहा परमात्मा का निवास है। उसका दरवाजा आंखो के पीछे तीसरा तिल है।
हजरत ईसा भी इसी ओर इशारा करते है जब वे कहते है, “ढूंढो और तुम्हे मिलेगा, खटखटाओ और वह तुम्हारे लिए खोला जाएगा।” (बाइबल मेथयू 7:7)