
हमारे मन में कुदरती ही यह विचार आता है कि अगर परमात्मा हर एक के अंदर है तो हमे अपने अंदर नजर क्यो नही आता? हमारे अंदर किस चीज की रुकावट है? वह रुकावट किस प्रकार दूर हो सकती है? गुरु अर्जुन देव फरमाते है:
अंतर अलख न जाई लखया, विच परदा हउमे पाई।।
अंतर में अलख यानी परमात्मा तब तक दिखाई नहीं देता जब तक हउमे यानी अहंकार का बारीक पर्दा है।हमने अपने आपको उस परमात्मा से अलग समझा है। हमने अपनी अलग हस्ती बना रखी है।मेरी ओलाद है, मेरी जायदाद, मेरी धन दौलत, ये मेरा, ये भी मेरा, ये मेरी वजह से है, ये में ना करता तो ऐसा हो ही नहीं सकता। ये सब हउमे यानी अहंकार की भावना है।ये सब असल में उस परमात्मा का है। जब तक तू ही तू की भावना नहीं आयेगी तब तक अंतर में कुछ भी नहीं दिखता।
एका संगत इकत गृह बसते, मिल बात न करते भाई।।
आत्मा और परमात्मा शरीर में दोनों इकट्ठे ही रहते है और एक ही घर में दोनों निवास करते है, लेकिन आपस में मिलाप नहीं है। एक साथ रहते हुए कभी आत्मा ने परमात्मा को नहीं देखा। परमात्मा जरूर हमारे शरीर के अंदर है, लेकिन हमारे और मालिक के दरमियान हउमे की बड़ी जबरदस्त रुकावट है।
गुरु नानक देव जी फरमाते है:
जीवन मुकत सो आखिये, जिस विचहु हउमे जाइ।।
हम जीते जी मुक्ति प्राप्त कर सकते है, अगर हमारे अंदर से हउमे की रुकावट दूर हो जाए।