मुरली कौन बजावै हो , गगन मँडल के बीच ॥
त्रिकुटी संगम होय कर , गंग जमुन के घाट ।
या मुरली के सब्द से , सहज रचा बैराट ।
गंग जमुन बिच मुरली बाजै , उत्तर दिस धुन होय।
त उन मुरली की टेरहि सुनि सुनि , रहीं गोपिका मोहि ॥ जहँ अधर डाली हंसा बैठा , चूगत मुक्ता हीर ।
आनँद चकवा केल ‘ करत है , मानसरोवर तीर ॥
सब्द धुन मिदंग बाजै , बारह मास बसंत ।
अनहद ध्यान अखंड आतुर , धरत सबही संत ॥
कान्ह गोपी नृत्य करते , चरन बपु बिना ।
नैन बिन दरियाव देखै , अनंद रूप घना ॥
इस पद में दारेया साहिब ने अपने आंतरिक अनुभव के आधार पर अलौकिक मंडलों की ओर थोड़ा – सा संकेत किया है । आप कहते हैं कि गगन मंडल के बीचो – बीच शब्द की मुरलो जैसी सुरीली धुन उठ रही है । इसी शब्द से त्रिलोको की रचना हुई है । आत्मारूपो चकवे दशम द्वार में मानसरोवर के किनारे कलोल कर रहे हैं । यहाँ मृदंग जैसी शब्द को ध्वनि गूंज रही है और यहाँ सदा बसंत ऋतु रहती है । सभी संत वहाँ शब्द धुन के अखंड ध्यान में मग्न हैं । वहाँ आत्मारूपी गोपियाँ शब्दरूपी कृष्ण के साथ नृत्य कर रही हैं । दरिया साहिब कहते हैं कि उस परम आनंद का यह नज़ारा इन बाहरी आँखों के बिना ही दिखाई देता है ।
यह बानी (दरिया साहिब की बानी और जीवन चरित्र, पृष्ठ 45-46) में से है