*करू बेनती दऊ कर जोरी अरज सुनो राधास्वामी मोरी
स्वामीजी यहा पर आत्मा की पुकार का इस बेनती के जरीये वर्णन कर रहे है
यह प्रार्थना आत्मा अपने पती रूपी परमात्मा से यहा पर कर रही है , हे सच्चे पातशाहा मै दोनो हाथ जोडकर तुम्हारे सामने अरदास कर रही हू आप मेरी अरदास स्वीकार कर ले,आगे समझाते है
*सतपुरुष तुम सतगुरू दाता सब जीवन के पीता ओर माता
अब आत्मा बयान कर रही है , हे परमात्मा तुम ने ही यहा पर सतपुरुष का सतगुरू का साक्षात रूप धारण किया है और तुम इस जल थल मे सभी जीव जंतु पशु पक्षी पेड़ पोधे प्राणी के रखवाले हो माता पिता हो ये मे अच्छी तरह से समझ गई हु , आगे समझाते हैं
*दया धार अपना कर लीजे काल जाल से न्यारा कीजे
अब आत्मा समझ गई है की उसका रचनाकार कौन है और सब की यहा पर सभाल कौन कर रहा है , इसीलिए आत्मा यहा पर वो सतपुरुष सतगुरू को अरदास कर रही है पुकार रही है , कि हे सतगुरू आप अपनी दया करके मुझे इस आवागमन से, काल के जाल से आप मुक्त करालो आजाद करा लो, आगे
*सतयुग त्रेता व्दापर बीता काहुन जानी शबद की रीता
अब आत्मा अपनी खुद की अवस्था का बयान कर रही है , कि मै सतयुग मे भी किसी शरीर मे थी , ओर द्वापर युग मे भी किसी शरीर मे थी , पर मै तब आपको पहचान नही पाई तब मुझे आपका ज्ञात नही हुवा इसलिए चौरासी के चक्कर मे जनम जनम भटक रही हू , आगे समझाते है
कलयुग मे स्वामी दया वीचारी परकट करके शबद पुकारी*
अब मैने कलयुग मे भी एक नया शरीर धारण किया है , और आप भी यहा पर सतगुरू बनकर आये है , सब जीवो से शबद की नाम की भक्ती करवाने के लिए और आत्मा ये भी समझ गई है सतगुरू यहा पर क्यो आये है आप अगली कड़ी मे समझाते है
जीव काज स्वामी जग मे आये भव सागर से पार लगाये
यह आत्मा जन्मों जन्मों से जीवो जंतु के नये नये शरीर धारण करके दरबदर भटक रही है ओर अब आइ कलयुग मे भी उसने एक मनुष्य का नया शरीर धारण किया है सतगुरू की कृपा से , और उस परमात्मा ने भी इस युग मे सतगुरू बनकर शरीर धारण किया है जीवो को इस संसाररुपी भवसागर से पार करने के लिए ही सतगुरू यहा पर आये है ,ये भी यहा पर आत्मा समझ गई है, आगे समझाते है
*तीन छोड चोथा पद दीन्हा सतनाम सतगुरु गत चीन्हा
अब आत्मा यहा पर बेनती करके सतगुरू को कुछ मांग रही है आत्मा सतगुरू से बोल रही है दाता अब मुझे ये तीनो लोको का यानी आकाश पाताल पुथ्वी का आभासीक सुख नही चाहीये, ये तीनो लोक छोड के जो चोथा लोक सतलोक उस सतलोक मे अब मुझे कायम तेरे चरनो मे समा जाना है , आगे समझाते है
जगमग जोत होत ऊजीयारा गगण सोत पर चदर नीहारा
अब आत्मा को ये भी पता हो गया है की वो कहा से आई थी, इसीलिए वो अपने देश का यानी सचखंड का वर्णन कर रही है वो सतलोक मे एक अविनाशी अवर्णनीय परम जोत है , कई चंद्रमा की वहा पर शीतलता है , वहा पर प्रकाश ही प्रकाश है , गगन स्त्रोत यानी ,वो सब पाने के लीये दशम द्वार से तुरिया पद तक नाम की साधना से जाना है , अगली कड़ी मे स्वामीजी समझाते है
सेत सीहासन क्षत्र बीराजे अनहद शबद गैब धुन गाजे
आत्मा अपने देश का वर्णन कर रही है , उस सत लोक मे वो परम जोती का सेत यानी एक सफेद रग का तेजस्वी सिंहासन है , वहा पर गैब यानी गुप्त धुन सुननै में आती है उसे अनहद नाद कहते है , वो दिन रात बजता रहता है , उसका वर्णन शब्दो मे करना असंभव है वो अकथ है वो कहा नही जाता, आगे समझाते है
क्षर अक्षर नीक्क्षर पारा बीनती करे जहा दास तुम्हारा
अब आत्मा अपने निजघर का यानी सतलोक का परम परमात्मा के धाम का पता बता रही है
क्षर यानी त्रीकुटी देश के बाहर, अक्षर यानि सुन्न देश के आगे ,और निक्षर यानी महासुन्न देश भवरगुफा को पार करके वो सतलोक धाम की शुरुवात होती है , वहा पर सब जीव परमात्मा मे समाये है सब परम सुख से आनंदित है ,वो देश सुख ओर दुख के परे है इस प्रकार आत्मा अपना ठिकाना बता रही है , अब शबद की अंतिम कड़ी मे आत्मा अपनी बेनती पुरी करती है
लोक अलोक पाऊ सुख धामा चरन सरण दीजे बीसरामा
अब आत्मा परमात्मा से कहे रही है, लोक यानी तीनो लोक का संसार सुख के रहित, वो अलोक यानी परलोक का शाश्वत अविनाशी सतलोख मे सुख है , और अब मुझे इस संसार सागर मे नही अटकना है , मुझे अब आपके सतलोक सुख धाम से वापिस नही जाना है , अंत मे आत्मा परमात्मा से कह रही है , मुझे अब आपके चरनो मे ही ले लो ।