
सिमरन कैसे करें
मनुष्य जब मालिक का सिमरन लगातार , हर साँस के साथ किया जाता है , तो की चेतना जाग्रत होकर परमात्मा का अनुभव करती है । जिन सन्तों महात्माओं ने परमात्मा का अनुभव किया है , उसका साक्षात्कार किया है , उनके द्वारा दिये गये नाम का सिमरन अत्यन्त लाभदायक होता है , क्योंकि उससे गुरु और शिष्य के बीच सीधा भावनात्मक सम्बन्ध बन जाता है और सफलता जल्दी मिलती है । इस तरह आत्मा को रूहानी मण्डलों में किसी प्रकार की रुकावट नहीं होती और उसका सफ़र जल्दी तय हो जाता है ।
किसी सहज आसन पर बैठकर , आँखों के पीछे दोनों भृकुटियों के बीच में आत्मा के स्थान पर स्थिर होकर , सुरत की ज़बान द्वारा पूरे शौक़ और तत्परता के साथ सिमरन करना चाहिए । इस प्रकार सिमरन करने से मन की चंचलता दूर होती है और पूर्ण एकाग्रता हो जाती है । तन , मन और वचन को स्थिर रखकर , अडोल रहकर , विधिपूर्वक सिमरन करना चाहिए । साथ । ही सुरत और निरत को भी स्थिर करना चाहिए । कबीर साहिब कहते हैं कि ऐसे पूर्ण रीति से किये गये एक पल के सिमरन की बराबरी अन्य प्रकार से कल्प – पर्यन्त किये गये सिमरन भी नहीं कर सकते :
तन थिर मन थिर बचन थिर , सुरत निरत थिर होय । कह कबीर इस पलक को , कलप न पावै कोय ।। कबीर साखी – संग्रह , भाग 1 और 2 , पृ .89
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