
सच्चा शिष्य कौन ?
सबद मरै सोई जन पूरा ॥ सतगुर आख सुणाए सूरा ॥72
गुरु अमरदास सत्ता और बलवंडा नामक दो पाठी थे । वे गुरु अर्जुन साहिब के दरबार में कीर्तन किया करते थे । उन्हें भ्रम हो गया कि उनके कीर्तन के कारण ही इतनी संगत जुड़ती है । इसी अभिमान ने उन्हें लालची बना दिया । उनके घर एक जवान लड़की थी , जिसकी शादी की उन्हें फ़िक्र थी । एक दिन गुरु साहिब से कहने लगे कि लड़की की शादी करनी है , हमें कुछ रुपयों की ज़रूरत है । गुरु साहिब ने कहा , ‘ बहुत अच्छा । ‘ यह कहकर आपने सौ , दो सौ रुपये देने चाहे , लेकिन उन्होंने इनकार कर दिया और कहा कि आपके दरबार में सैकड़ों शिष्य आते हैं , आपको किस बात की कमी है ? अब संतों के पास इतना रुपया कहाँ ? जब गुरु साहिब ने कोई जवाब न दिया तो पाठी कहने लगे , और कुछ नहीं तो हमें कम से कम एक टका प्रति शिष्य वसूल कर दो । इससे हमारी बहुत मदद हो जायेगी ।
‘ उनका ख़याल था कि गुरु साहिब के शिष्य काबुल कंधार तक हैं , हमारे हज़ारों रुपये बन जायेंगे । महीना बीत गया पर पाठियों को कुछ भी प्राप्त न हुआ । उन्होंने गुरु जी से फिर विनती की कि उनकी माँग पूरी की जाये । गुरु जी ने कहा कि शीघ्र ही तुम्हारी माँग पूरी कर दी जायेगी । दो मास और बीत गये , पर न तो उन्हें कोई चढ़ावा ही आया और न ही गुरु जी ने किसी को चढ़ावा देने के लिए कहा ।
पाठी फिर गुरु जी के पास गये और उन्होंने अपनी अर्ज़ दोहरायी और कहा कि आप अपना वचन पूरा कीजिये । गुरु जी ने कहा कि कल तुम्हारी माँग पूरी हो जायेगी । पाठियों ने सोचा कि संगत जो भी लाती है उसे संगत पर ख़र्च कर दिया जाता है , गुरु जी अपने पास बचाकर कुछ भी नहीं रखते , तो वे कल अपना वचन कैसे पूरा करेंगे ? क्या वे किसीसे उधार लेकर देंगे ? लेकिन जब दूसरे दिन गुरु साहिब ने साढ़े चार टके आगे रख दिये , तो वे देखकर हैरान रह गये । गुरु साहिब ने उनकी हैरानी दूर करते हुए कहा , ‘ पहले सिक्ख गुरु नानक साहिब , दूसरे सिक्ख गुरु अंगद देव , तीसरे सिक्ख गुरु अमरदास , चौथे सिक्ख गुरु रामदास जी , और मैं अभी आधा सिक्ख ही हूँ । इसलिए मैं तुम्हें वही दे रहा हूँ जो तुमने माँगा है यानी एक टका प्रति सिक्ख । ‘ गुरु जी ने फ़रमाया , ‘ भाई ! सच्चा शिष्य बनना आसान नहीं है । दुनियावी इच्छाओं और प्रलोभनों को त्यागकर केवल प्रभुभक्ति की ओर ध्यान देना चाहिए । प्रभुप्रेम को दुनिया के धन से नहीं आँका जा सकता । ‘
Source: परमार्थी साखियां (science of the soul)