इंद्र का तीर – कमान

जेती लहरि समंद की , तेते मनहिं मनोरथ मारि । बैसै सब संतोष करि , गहि आतम एक बिचारि।।56 संत दादू दयाल

एक ऋषि ने इतनी तपस्या की कि स्वर्ग के राजा इंद्र को डर लगने लगा कि कहीं ऋषि उसका सिंहासन न छीन ले । वह हाथ में तीर – कमान लेकर शिकारी का रूप धारण करके ऋषि की कुटिया पर आया और अर्ज़ की कि मैं किसी काम से जा रहा हूँ , मेरे पास यह तीर – कमान है जो बहुत भारी है , मुझे अभी इसकी ज़रूरत नहीं है , इसलिए इसे अपने पास रख लें । थोड़ी देर बाद आकर ले जाऊँगा । ऋषि ने कहा कि मैं ऋषि ! यह तीर – कमान ! मेरा इसका क्या संबंध ! इंद्र ने मिन्नत की कि कृपा करके रख लो । मैं थोड़ी देर में आकर इसे ले जाऊँगा । ऋषि ने कहा , ‘ यह तो जीवों को मारने के लिए इस्तेमाल किया जाता है । मेरा हृदय तो ऐसी चीजें देखकर भी दु : खी होता है । इसलिए मैं इसका ख़याल कैसे रखूगा ? ‘ शिकारी ने नम्रता से कहा , ‘ मान्यवर ! मेरे पास एक सुझाव है । मैं तीर – कमान को कुटिया के पीछे रख देता हूँ । आप इसे कभी न देखेंगें और इस तरह आप मुझे एक बड़ी आपत्ति से बचा लेंगे । ‘ और फिर इंद्र ने ऋषि की बड़ाई करनी शुरू कर दी कि आप ऐसे हैं , आप वैसे हैं , मुझ पर दया करो । जब बहुत बार कहा तो ऋषि ने मान लिया और कहा कि इसको कुटिया के कोने में रख दो ।

इंद्र तो तीर – कमान रखकर चलता बना , अब वापस किसे आना था ? ऋषि पहले राजा था और तीर – कमान चलाने में अच्छी तरह माहिर था । इसलिए जब भजन से उठता तो तीर – कमान का ख़याल आ जाता । रोज़ – रोज़ तीर – कमान का ध्यान मन में पक्का होता गया । एक दिन कहता है , ‘ कभी हम भी तीर चलाते थे , ज़रा चलाकर तो देखें , किसी को मारेंगे नहीं । ‘ यह सोचकर , तीर – कमान हाथ में लेकर तीर चलाया , सीधा निशाने पर जा लगा । और शौक़ बढ़ा । रोज़ – रोज़ अभ्यास करने लगा । आख़िर वह पूरा शिकारी बन गया । भजन – बंदगी छूट गयी और लगा शिकार के पीछे – पीछे फिरने ।

सो ऐसे हैं मन के धोखे । ज़रा – सा इसको ढीला छोड़ो , झट बुरी आदतें अपना लेता है ।

Published by Pradeep Th

अनमोल मनुष्य जन्म और आध्यात्मिकता

Leave a comment

Design a site like this with WordPress.com
Get started