प्रेम की मस्ती

ऐसे प्रेमी , सतगुरु के प्रेम और मुहब्बत में फ़ना होकर ( अपने आप को पूर्णतया खोकर ) अमर जीवन का रस पीते हैं और उसका आनंद प्राप्त करते हैं । महाराज सावन सिंह

एक बार जब कृष्ण जी विदुर के घर गये , उस समय वह घर पर नहीं थे । उनकी पत्नी नहा रही थी । द्वार पर कृष्ण जी ने आवाज़ दी । आवाज़ सुनते ही वह प्रेम में इतनी मस्त हो गयी कि उसे इतना भी होश न रहा कि कपड़े पहन लूँ । बिना कपड़ों के ही उठ भागी । ऐसी हालत में न पाप है , न पुण्य । कृष्ण जी ने कहा कि कपड़े तो पहन । तब उसने कपड़े पहने ।

अब घर में खाने – पीने का कोई सामान नहीं था । सिर्फ केले रखे थे । वह प्रेम में इतनी मग्न हो गयी कि केले छील – छीलकर छिलका कृष्ण जी को देने लगी और गूदा फेंकने लगी । इतने में विदुर आ गये । जब उन्होंने देखा तो कहा , ‘ अरी पगली ! यह क्या कर रही है ? ‘ यह सुनकर वह बोली , ‘ ओहो ! मुझे पता नहीं चला । ‘ फिर उसने कृष्ण जी को केले का फल दिया तो कृष्ण जी ने कहा , ‘ विदुर ! इसमें वह स्वाद नहीं है जो छिलके में था । ‘

यह है प्रेम की अवस्था ।

Published by Pradeep Th

अनमोल मनुष्य जन्म और आध्यात्मिकता

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