एक घड़ी की संगति

गोबिंद जीउ सतसंगत मेल हर धिआईऐ । गुरु रामदास

एक साहूकार का नियम था कि वह अपने असामियों से सूद – दर – सूद लिया करता था । एक दिन वह एक गाँव में किसी ग़रीब किसान के घर अपने पैसों की वसूली करने गया । ब्याज कम करने के लिए किसान ने बहुत ज़ोर लगाया , पर साहूकार ने एक न सुनी । उसके बछड़े – बछड़ियाँ और जो अनाज था सभी ब्याज में गिन लिया , एक कौड़ी भी न छोड़ी । किसान ने दिल में कहा , ‘ अच्छा लाला ! अब जा और अपना बिस्तरा अपने आप उठाकर ले जा । ‘ साहूकार मज़दूर ढूँढ़ रहा पा , क्योंकि किसान ने उसके इस व्यवहार के कारण उसे कोई मज़दूर लाकर नहीं दिया था । अब गाँव में मज़दूर कहाँ से मिले ? संयोग से वहाँ नज़दीक ही एक महात्मा बैठा भजन कर रहा था । उसने साहूकार और किसान के बीच हुई सारी बात को सुन लिया था । महात्मा ने उस घमंडी साहूकार से कहा , ‘ मैं तेरा बिस्तरा उठाकर ले चलता हूँ , लेकिन एक शर्त है कि या तो तू मालिक की स्तुति और प्यार की बातें करते जाना और मैं सुनता जाऊँगा , या मैं करता जाऊँगा और तू सुनते जाना । ‘ लाला ने सोचा कि यह कौन – सी मुश्किल बात है । यह बातें करता जायेगा और मैं हाँ हाँ करता जाऊँगा । महात्मा ने उसका बिस्तरा उठा लिया और प्रभुप्रेम की बातें करते हुए चल पड़ा । जब उसका गाँव आ गया तो महात्मा ने कहा कि लो लाला जी , मैं अब जाता हूँ , पर महात्मा ने दिल में सोचा कि यह भी क्या याद करेगा कि मेरा किसी महात्मा से मिलाप हुआ था , इसलिए इसको कुछ बताना चाहिए । महात्मा ने साहूकार से कहा , ‘ आज से आठ दिन के बाद तेरी मौत हो जायेगी । तेरी सारी उम्र में कोई अच्छे कर्म नहीं हैं । यह जो एक घंटा मेरे साथ बातें की हैं , वही एक श्रेष्ठ कर्म है । जब तुम्हें यमदूत ले जायेंगे और पूछेगे कि इस एक घंटे के सत्संग का फल पहले लेना है कि बाद में ? तब तुम कह देना कि पहले , और फल यही माँगना कि मुझे उस महात्मा के दर्शन कराओ । फिर जो होगा तुम ख़ुद देख लोगे । ‘

जब मौत आयी , धर्मराज के यमदूत आये और साहूकार को पकड़कर ले गये । जब पेश हुआ तो धर्मराज ने चित्रगुप्त से कहा कि इसके कर्मों का लेखा देखो । उसका कोई श्रेष्ठ कर्म नहीं था , सिवाय इसके कि उसने एक महात्मा के साथ एक घंटा बातें की थीं । धर्मराज ने पूछा कि तुझे इसका फल पहले लेना है कि बाद में ? साहूकार कहने लगा कि पहले दे ” दो और जहाँ वह महात्मा है , मुझे वहाँ ले चलो । महात्माओं का शरीर इस दुनिया में होता है , लेकिन उनकी सुरत खंडों – ब्रह्मांडों पर रहती है । यमदूत उसे अपने साथ वहाँ ले गये जहाँ वह महात्मा भजन कर रहा था । महात्मा ने कहा , ‘ भाई साहूकार , तू आ गया ? ‘ साहूकार ने कहा , ‘ जी हाँ , आपकी कृपा से से आ गया हूँ , लेकिन यमदूत बाहर खड़े मेरा इंतज़ार कर रहे हैं । ‘

अब जहाँ मालिक का भजन – सुमिरन हो वहाँ यमदूत नहीं जा सकते । साहूकार को उस महात्मा के पास बैठे आनंद लेते हुए काफ़ी देर हो गयी । उसका एक घंटे के सत्संग का फल ख़त्म हो गया । बाहर यमदूत खड़े थे और आवाज़ों से तथा इशारों से उसे बुला रहे थे । लेकिन वह बाहर नहीं आया । महात्मा ने कहा , ‘ चुपचाप बैठे रहो , यमदूत यहाँ नहीं आ सकते । ‘ हारकर यमदूत चले गये । धर्मराज के आगे शिकायत की कि जी ! वह नहीं आता । धर्मराज ने कहा कि वहाँ न मेरा गुज़ारा है न तुम्हारा , इसलिए अब उसका ख़याल छोड़ दो । सो पूर्ण साधु के एक मिनट के सत्संग के बराबर कोई कर्म नहीं है ।

गुरु अर्जुन देव जी कहते हैं : जह साधू गोबिद भजन कीरतन नानक नीत ॥ शाणा हउ णा तूं णह छुटह निकट न जाईअहो दूत।।

Published by Pradeep Th

अनमोल मनुष्य जन्म और आध्यात्मिकता

One thought on “एक घड़ी की संगति

Leave a comment

Design a site like this with WordPress.com
Get started