प्रभु की इच्छा या इंसान की मरज़ी

मनुष्य अपनी विपत्तियों को निमंत्रण देता है और फिर इन दुःखदायी अतिथियों के प्रति विरोध प्रकट करता है , क्योंकि वह भूल जाता है कि उसने कैसे , कब और कहाँ उन्हें निमंत्रण पत्र लिखे तथा भेजे थे । परंतु समय नहीं भूलता ; समय उचित अवसर पर हर निमंत्रण – पत्र ठीक पते पर दे देता है , और समय ही हर अतिथि को मेज़बान के घर पहुंचाता है । किताब – ए – मीरदाद

जल्हण नौशहरा में एक अच्छा कमाई वाला महात्मा हुआ है । ज़िक्र है कि उसके एक लड़की थी । जब वह जवान हुई तो जल्हण की पत्नी ने कहा कि किसी पंडित के पास जाओ और लड़की के लिए कोई अच्छा – सा वर और उसकी शादी का मुहूर्त निकलवाओ । अब जल्हण कमाईवाला महात्मा था , यह काम उसके स्वभाव के अनुकूल नहीं था क्योंकि उसके विचार बिलकुल अलग तरह के थे । वह हमेशा मालिक की मौज में ख़ुश रहता था और हर कार्य को प्रभु प्रियतम की इच्छा पर छोड़ देता था । वह अपने लंबे अनुभव से जानता था कि अंत में होता वही है जो प्रभु की इच्छा हो । लेकिन जब पत्नी ने मजबूर किया तो एक जाने – माने पंडित के घर गया । आगे उसके दरवाज़े पर एक जवान लड़की देखी । पता चला कि वह पंडित की लड़की है और विवाह के थोड़े समय बाद ही विधवा हो गयी है । वह सोचने लगा , सभी लोग पंडित से अपनी लड़कियों की शादी का मुहूर्त निकलवाते हैं पर यहाँ पंडित की अपनी लड़की विधवा हो चुकी है । क्या उसने अपनी बेटी की शादी का मुहूर्त नहीं निकाला था ? उसने पंडित के पास जाने का विचार छोड़ दिया और गली में आगे चलता गया । आगे गया तो हकीम का मकान नज़र आया । क्या देखते हैं कि उसके घर रोना – पीटना हो रहा है । जल्हण ने हकीम के नौकर से पूछा कि क्या कोई भयंकर हादसा हो गया है ? नौकर ने बताया कि हकीम का बेटा मर गया है । जल्हण फिर सोचने लगा कि संसार की नित्य प्रतिक्रिया कैसे चल रही है ? उसने अपने आप से कहा , ‘ यहाँ इस घर में एक सयाना हकीम है जो अपने इकलौते बेटे को बचाने का भरपूर यत्न करता है , पर उत्तम इलाज के बावजूद उसका बेटा चल बसा है । यह हकीम उसे क्यों नहीं बचा सका ? ‘ लोग कहने लगे , ‘ परमात्मा की मौज को कौन टाल सकता है । ‘ उसने धूल भरी गली में चलते – चलते मुस्कराते हुए अपने मन में कहा :

घर वैदां दे पिटणा , घर ब्राह्मण दे रंड । चल जल्हण घर आपणे , साहा देख न संग ॥

Published by Pradeep Th

अनमोल मनुष्य जन्म और आध्यात्मिकता

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