जीव अपने सब सुख – दुःख प्रारब्ध कर्मों के अनुसार पाता है और मनुष्य जैसे भले – बुरे कर्म करता है , उनके अनुसार वैसे ही ऊँची – नीची योनियाँ भोगता है । महाराज सावन सिंह
एक बार धृतराष्ट्र ने भगवान कृष्ण से पूछा कि मैं अंधा क्यों हूँ । मुझे पिछले सौ जन्मों की तो ख़बर है । इन सौ जन्मों में मैंने कोई ऐसा कर्म नहीं किया जिसके कारण मैं जन्म से अंधा हूँ । श्री कृष्ण ने धृतराष्ट्र के सिर पर हाथ रखकर कहा कि और पीछे देखो । जब देखा तो एक सौ छ : जन्म पहले का एक ऐसा कर्म निकला जिसके कारण वह अंधा हुआ ।
सो कर्मों का जाल बड़ा पेचीदा है ।