सील गहनि सब की सहनि , कहनि हीय मुख राम । तुलसी रहिए एहि रहनि , संत जनन को काम ॥ गोस्वामी तुलसीदास
दादू जी एक कामिल फ़क़ीर हुए हैं । उनका जन्म मुसलमान परिवार में हुआ था । एक बार दो पंडित आपके पास इस ग़रज़ से आये कि चलकर सत्संग सुनें और गुरु धारण करें । जब उनकी कुटिया के पास पहुंचे तो देखा कि आगे एक आदमी नंगे सिर बाहर जा रहा था । पंडितों ने अपशकुन समझा कि नंगे सिर वाला आदमी मिला है । अपशकुन टालने के लिए उस नंगे सिर वाले व्यक्ति के सिर पर दो तमाचे मार दिये । फिर पूछा कि दादू का डेरा कहाँ है ? उसने अँगुली से इशारा करते हुए कहा कि वह रहा । जब डेरे पहुँचे तो पता चला कि दादू साहिब बाहर गये हुए हैं । उन्होंने इंतज़ार किया । जब दादू साहिब आये और पंडितों ने देखा कि यह तो वही है जिसके सिर पर दो तमाचे मारे थे , तो काँपने लगे । लेकिन दादू साहिब हँस पड़े और बोले , ‘ लोग दो टके की हाँडी लेने से पहले उसे टकोर लेते हैं , आप तो गुरु धारण करने आये हो , खूब परखो । ज जब दिल माने विश्वास करो , फिर गुरु स्वीकार करो । ‘
महात्मा बड़े शांत स्वभाव के होते हैं । संतों में नम्रता , धैर्य और क्षमा होती है , उसको बयान कर सकना संभव नहीं । गुरु धारण करने से पहले पूरी तसल्ली कर लेनी चाहिए , क्योंकि गुरु में पूर्ण विश्वास के बिना परमार्थ में उन्नति नहीं की जा सकती ।