जनम जनम की इस मन कउ मल लागी काला होआ सिआह ॥ खंनली धोती उजली न होवई जे सउ धोवण पाह।।14 गुरु अमरदास
पराशर जी सारी उम्र योगाभ्यास में रहे । पूर्ण योगी होकर घर को वापस आ रहे थे । रास्ते में एक नदी पड़ती थी । जब वहाँ आये तो मल्लाह से कहा कि मुझे पार उतार दो । मल्लाह ने कहा कि हम रोटी खा लें , रोटी खाकर तुम्हें पार उतार देंगे । पराशर जी कहने लगे , धूप चढ़ जायेगी , मुझे जल्दी पार पहुँचा दो , नहीं तो मैं श्राप दे दूंगा । अब जो काम माँ – बाप करते हैं , बच्चे भी बड़ी आसानी से कर लेते हैं । मल्लाह की लड़की ने बाँस लिया , नाव की रस्सी खोली और कहा , पिता जी , मैं इन्हें पार उतारकर आती हूँ ।
अब ऋषि सारी उम्र जंगलों में रहा , औरत की शक्ल नहीं देखी थी । देखकर मन चलायमान हो गया । अपना बुरा विचार प्रकट किया । लड़की ने कहा कि हम लोग मछुए हैं , मेरे मुँह से आपको बदबू आयेगी । ऋषि ने कहा कि योजन गंधारी हो जा । उसके मुँह से चार – पाँच मील तक ख़ुशबू आने लगी । लड़की बोली , सूर्य देवता देख रहे हैं कि हम पाप करने लगे हैं , ये हमारी गवाही देंगे । ऋषि ने पानी की चुल्ली भरकर मारी और चारों ओर धुंध कर दी । लड़की फिर कहने लगी कि यह जल वरुण देवता हैं , यह देख रहे हैं । ऋषि ने रेत की मुट्ठी लेकर दरिया में फेंक दी और कहा, रेत बन जा । पानी की जगह रेत हो गयी ।
देखो ! मन कितना ख़तरनाक है । पूर्ण गुरु की शरण न लेने के कारण महात्मा अपने मन को नहीं रोक सके बल्कि योग द्वारा प्राप्त अपनी सारी कमाई नष्ट कर दी ।