कई जनम भए कीट पतंगा ॥ कई जनम गज मीन कुरंगा ॥ कई जनम पंखी सरप होइओ ॥ कई जनम हैवर ब्रिख जोइओ । मिल जगदीस मिलन की बरीआ ॥ चिरंकाल इह देह संजरीआ ॥ गुरु अर्जुन देव
एक आदमी अंधा भी था और साथ ही गंजा भी था । थोड़ी सी ग़लती के कारण राजा ने उस बेचारे को एक ऐसी जेल में बंद कर दिया जो खास तौर पर भूलभुलैयाँ जैसी बनायी गयी थी । उस जेल के कई नक़ली दरवाज़े थे पर बाहर जाने के लिए एक ही दरवाज़ा था । राजा का हुक्म था कि जो कोई उस ठीक दरवाज़े को ढूँढ़कर बाहर निकल जायेगा , उसको छोड़ दिया जायेगा ।
काफ़ी देर तक वह अंधा आदमी जेल की दीवारों के साथ – साथ असली दरवाज़े को ढूँढ़ता रहा , परंतु जब वह दरवाज़े के पास आता तो अचानक उसके सिर में खुजली होने लगती । वह सिर में खुजली करने लग जाता और दरवाज़े से आगे निकल जाता । इसी तरह हर बार जब वह दरवाजे के पास आता , तो उसके सिर में खुजली हो जाती और वह असली दरवाज़े को ढूँढ़ न पाता । इस प्रकार वह जेल की दीवारों के साथ – साथ घूमता रहता और हर बार असली दरवाज़े से आगे निकल जाता ।
यही हाल हमारा है । जब मनुष्य – जन्म मिलता है तो उसे मन की लज्ज़तों में गुज़ार देते हैं और फिर से चौरासी के चक्कर में जाते हैं । यही वक़्त मुक्ति का होता है , जिसे हम गँवा देते हैं । पड़