कहा भइओ जर तन भइओ छिन छिन । प्रेम जाए तउ डरपे तेरो जन ‘ गुरु रविदास
अनलहक ‘ जिसका अर्थ है कि मैं खुदा हूँ , कहने पर हजरत मनसूर को बादाद में सूली पर चढ़ाने की सज़ा सुनायी गयीं । उस पर जोर डाला गया कि वह ‘ अल्लाह हू हक ‘ कहे , पर मनसूर ने यह कहने से इनकार कर दिया । जब मनसूर को सूली पर चढ़ाने लगे तो हुक्म हुआ कि पहले इसको पत्थर मारे जायें । उसे बग़दाद शहर के चौक में ले जाया गया और लोगों को उसे पत्थर मारने का हुक्म दिया गया । जब लोगों ने पत्थर मारे , वह चुपचाप खड़ा रहा , उफ़ तक न की । शेख शिबली मनसूर का दोस्त भी था और उसके राज़ और उसकी शक्ति से भी वाकिफ़ था । उसने सोचा कि अगर मैंने पत्थर मारा तो उचित नहीं , क्योंकि यह फ़कीर है और अगर शरहवालों अर्थात मुसलमानों के कर्मकांड में विश्वास रखनेवालों का खयाल करूं तो मारना ही पड़ेगा ।
आखिर उसने फूल मारा । जब मनसूर को फूल लगा तो वह कराह उठा , ‘ हाय ! ‘ शिबली ने पूछा कि तूने हाय क्यों की ? मनसूर ने उत्तर दिया कि तू मेरे राज़ को जानता था , लोग नहीं जानते थे , इसलिए मुझे तेरे फूल की चोट लोगों के पत्थरों की चोट से भी ज्यादा लगी ।
जब उसे सूली पर चढ़ाने लगे तो पहले उसके हाथ काट दिये गये । उसने कहा मुझे इन हाथों का कोई फ़िक्र नहीं । मेरे पास वे हाथ हैं कि एक यहाँ और एक किंगराए अर्श * पर है । फिर पैर काट दिये गये । वह बोला कि मेरे पास वे पैर हैं कि एक यहाँ और एक परमात्मा की दरगाह में है ।