बकरा और बंदर

मन लज़्ज़त का आशिक़ है , जब इसे पहले से कोई अच्छी चीज़ मिल जाये तो यह पहली को छोड़ देगा , दूसरी के पीछे दौड़ेगा । इसे दुनिया की करोड़ों लज़्ज़तें दें , मन वश में नहीं आता । महाराज सावन सिंह

एक बार सत्संग के दौरान एक आदमी ने खड़े होकर बड़े महाराज जी से विनती करते हुए अपनी किसी भूल की क्षमा माँगी । अपनी दीनता को दर्शाते हुए उसने अपने गले में जूतों की माला डाल रखी थी । बड़े महाराज जी ने उससे पूछा कि शरीर को सज़ा देने का क्या फ़ायदा अगर असली मुजरिम मन , आज़ाद घूमता फिरे ? अपनी बात को स्पष्ट करने के लिए आपने यह कहानी सुनायी :

एक स्त्री ने एक बकरा और एक बंदर पाल रखा था और उन दोनों को उसने घर के पास बाँधा हुआ था । एक दिन उसने बड़े प्रेम के साथ खाना बनाया और दही लेने के लिए बाज़ार चली गयी । बंदर ने अपने हाथों से अपनी रस्सी खोलकर , रोटियाँ खाकर बकरे की रस्सी खोल दी और अपने गले में उसी तरह अपनी रस्सी डाल ली । जब वह स्त्री वापस आयी तो देखा कि खाना नहीं है और बकरा खुला फिर रहा है । लगी बकरे को मारने । कोई सज्जन यह सब देख रहा था । उसने कहा कि यह बकरा बेक़सूर है , सारा क़सूर उस बंदर का है ।

सो अपनी कामना पूरी करने के लिए यह मनरूपी बंदर सब कुछ कर लेता है । असली क़सूर तो मन का होता है लेकिन सज़ा बेचारे शरीर को भुगतनी पड़ती है ।

Published by Pradeep Th

अनमोल मनुष्य जन्म और आध्यात्मिकता

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