झूठे वायदों की सज़ा

अनेक लोग अपने ज्ञान का प्रदर्शन करके अपनी प्रशंसा करवाने का प्रयास करते है पर वे धन्य हैं जिन्होंने प्रभु प्रेम के लिए अपने मन को अन्य सभी इच्छाओं से ख़ाली कर दिया है । सेंट फ्रांसिस ऑफ़ असिसी

ज़िक्र है कि बुल्लेशाह बड़ा आलिम – फ़ाज़िल था । चालीस साल खोज की , बहुत – से शास्त्र और धार्मिक किताबें पढ़ीं , अनेक महात्माओं और नेक लोगों से वार्तालाप किया लेकिन कुछ हासिल न हुआ । आख़िर उसको एक मित्र ने जो परमार्थ में काफ़ी आगे था और जिसे बुल्लेशाह की हालत का ज्ञान था , कहा , ‘ भाई साहिब , किताबों से क्यों माथापच्ची करते हो , ये सब बेकार हैं । इनायत शाह के पास जाओ । शायद वह परमार्थी खोज में तुम्हारी मदद कर सकें । ‘ जब उनके पास गया , उन्होंने रास्ता बताया तो अंदर परदा खुल गया । परदा तो खुलना ही था , क्योंकि अंदर प्रेम था ।

जब परदा खुला तो उसने वे कार्य किये , जिनको बाहर की आँखें रखनेवाले लोग अनुचित समझते हैं क्योंकि मुल्ला और क़ाज़ी तो शरीअत को ही परमार्थ समझते हैं पर सच्चे या आंतरिक भेद के बारे में वे बिलकुल बेख़बर हैं । जब शरीअतवाले लोगों ने सुना तो कहा कि यह कुफ्र कर रहा है । इस पर फ़तवा लगाना चाहिए । सारे इकट्ठे होकर बुल्लेशाह के पास गये और कहा कि तुम ऐसी बातें करते हो जो शरीअत के विरुद्ध हैं । क्या आप अपने पक्ष में कुछ कहना चाहते हो ?

बुल्लेशाह ने कहा , ‘ पहले आप मेरे एक मुक़द्दमे का फ़ैसला कर दो , फिर जो आपकी मरज़ी हो करना । ‘ उन्होंने पूछा , ‘ तेरा मुक़द्दमा क्या है ? ‘ तब बुल्लेशाह ने कहा , ‘ अगर कोई आदमी रोज़ कहे कि मैं अमुक चीज़ तुझे आज दूंगा , कल दूंगा , यहाँ से दूँगा , वहाँ से दूंगा , लेकिन दे कुछ न ,बल्कि चालीस साल इसी तरह टालता रहे , आप उस पर क्या फ़तवा लगाओगे ? ‘ वे कहने लगे , ‘ ऐसे व्यक्ति को जिंदा जला देना चाहिए । ‘ यह सुनकर बुल्लेशाह ने कहा कि वह ये किताबें हैं । इन शरीअतवालों ने चालीस साल वायदे किये लेकिन दिया कुछ नहीं । सब ला – जवाब होकर अपने – अपने घर चले गये । तब बुल्लेशाह ने कहा : इल्मों बस करीं ओ यार ।… इक्को अलफ़ तेरे दरकार ।

परमार्थ में इल्म की नहीं , प्रेम और अमल की ज़रूरत है ।

Published by Pradeep Th

अनमोल मनुष्य जन्म और आध्यात्मिकता

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