फिर कभी जलेबी मत माँगना

साकत नर प्रानी सद भूखे नित भूखन भूख करीजै ॥ गुरु रामदास

ज़िक्र है कि एक मुसलमान फ़क़ीर एक दिन बाज़ार से गुज़र रहा था । रास्ते में एक हलवाई की दुकान थी । उसने बड़ी अच्छी जलेबियाँ सजाकर रखी हुई थीं । मन ने कहा कि जलेबियाँ खानी हैं । पास पैसा था नहीं , करे तो क्या करे । मन को समझाया – बुझाया , लेकिन मन न माना ।आखिर वहा से वापस चला आया ।

मन की आदत है कि इसको जिस तरफ़ से मोड़ो उधर ही जाता है । जब रात को भजन में बैठा तो जलेबियाँ सामने । मन बाहर जाने लगा । फ़क़ीर उठ गया । जब फिर बैठा , फिर वही ख़याल सामने आया । जब सुबह हुई तो वह पैसे कमाने के लिए काम करने गया । गर्मी बहुत थी और उसका मालिक बहुत कड़े स्वभाव का था । जैसे – तैसे शाम को थककर चूर होकर लड़खड़ाता हुआ बाज़ार आया क्योंकि उसका मन जलेबियाँ खाना चाहता था ।

उस समय जलेबियाँ सस्ती थीं । रुपये की तीन सेर होती थीं । तीन सेर जलेबियाँ ख़रीदी और जंगल में ले गया । कुछ खायीं , पेट भर गया । मन से कहा कि और खा । और खायीं , आख़िर मन ने मुँह फेर लिया । फिर बोला कि और खा । और खायीं तो उलटी हो गयी । जब उलटी हो गयी तो मन को हुक्म दिया कि अब इस उलटी को भी खा । आख़िर हारकर मन ने कहा कि फिर कभी जलेबियाँ नहीं माँगूंगा ।

सो मन बातों से वश में नहीं आता ।

Published by Pradeep Th

अनमोल मनुष्य जन्म और आध्यात्मिकता

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