
” मेरे मालिक, मै बिलकुल नादान हूं, मै नहीं जानता तुझसे क्या मांगू? जो तू मेरे लिए उचित समझे वहीं दे दे और मुझे वो शक्ति और बुद्धि बक्ष कि जो कुछ तू दे या जहां और जैसे तू रखे उसी में मै सदा खुश रहूं । मुझमें कोई गुण नहीं, कोई भक्ति नहीं। मेरे कर्म काले और पाप पूर्ण है। मुझमें कोई अच्छाई नहीं। मन ने मुझे पूरी तरह से कुचल दिया है। मुझ जैसे पापी के लिए तेरे चरणों के सिवाय और कोई अोट नहीं है। मुझे अपनी शरण में ले ले। मुझे और कुछ नहीं चाहिए, मुझे अपना दास बना ले ताकि मै तेरा हो जाऊ ,तू मेरा हो जाय।” हुजूर महाराज सावन सिंह जी (संत समागम)
क्या हम ऐसी प्रार्थना करते है? हम तो प्रार्थनाओं में सिर्फ दुनिया की चीजे मांगने में लगे हुए है। जो आगे जाकर वही प्रार्थनाएं हमारे दुख का कारण हो जाती है। जैसे हम औलाद औलाद करते है फिर उसी औलाद से दुखी होते है।
क्या हम गलत प्रार्थनाएं नहीं कर रहे? , इसीलिए आज हम दुखी है। क्या हम ऐसी प्रार्थनाएं करके उस परम शक्ति मान मालिक के विवेक और बुद्धि पर प्रश्न चिन्ह नहीं लगा रहे ? क्या हम परमात्मा को अनजाने में ये नहीं कह रहे कि तू ऐसा कर, ऐसा नहीं कर? हम तुच्छ इंसान छोटी बुद्धि वाले जिसको यह नहीं पता कि अगले क्षण क्या होगा, हम उस जानी जान (जो सब कुछ जानता है) को अपनी इच्छा से काम करने के लिए कह रहे है।
“असल में सच्ची प्रार्थना मनुष्य को नम्र बनाती है और उसके घमंड और अहंकार को दूर करती है। मनुष्य को उसकी लाचारी और बेबसी को प्रकट करती है। ये मनुष्य को भक्ति, पवित्रता तथा ईश्वर परायानता प्रदान करती है। हमारा सम्पूर्ण जीवन ही प्रार्थनामय होना चाहिए। प्रार्थना हमारा हृदय शुद्द कर देती है।” हुजूर महाराज सावन सिंह जी