जो गुरु का भक्त है वह चाहे कैसा भी है , लेकिन गुरु उसे नरकों में नहीं जाने देता । महाराज सावन सिंह
जब राजा जनक स्थूल शरीर को त्यागकर अपने धाम की ओर जा रहे थे , रास्ते में क्या देखते हैं कि नरकों में जीव जल रहे हैं और चीख – पुकार कर रहे हैं । उन्होंने पहले यमदूतों से पूछा कि इन्हें यातनाएँ क्यों दी जा रही हैं ? कोई जवाब न पाकर धर्मराज से पूछा कि इनका छुटकारा कैसे हो सकता है ? धर्मराज ने कहा कि अगर कोई महात्मा अपने नाम की कमाई दे तो आज़ाद हो सकते हैं । राजा जनक ने वहाँ ढाई घड़ी के तप का फल दिया और तब वे जीव नरक से आज़ाद होकर मृत्युलोक में आ गये और उन्हें मनुष्य – जन्म मिला ।