सन्तों – महात्माओं ने आन्तरिक सूक्ष्म रूहानी अनुभवों , रूहानी मण्डलों की स्थिति और परमात्मा से मिलाप के सहज ज्ञान और आनन्द को अकथ , अकह , ला – बयान कहा है । यह गूंगे का गुड़ है । जिस तरह गूंगा व्यक्ति गुड़ का स्वाद बयान नहीं कर सकता , उसी प्रकार इस सूक्ष्म अनुभव को स्थूल इन्द्रियों के स्तर पर किसी सांसारिक भाषा में बयान कर सकना असम्भव है । जिस तरह बाहरी जगत् में आगरा के ताजमहल , अमृतसर के हरमन्दर साहिब की सुन्दरता की तुलना किसी दूसरी चीज़ से नहीं की जा सकती , उसी प्रकार आन्तरिक सूक्ष्म आनन्द भी किसी बाहरी वस्तु या किसी बाहरी रस से तुलना नहीं की जा सकती है । भीखा साहिब कहते हैं :
भीखा बात अगम की कहन सुनन में नाहिं । जो जाने सो कहे ना कहे सो जाने नाहिं ।
आप समझाते हैं कि आन्तरिक सूक्ष्म रूहानी अनुभव भाषा में बयान नहीं किये जा सकते , जिसके अन्तर में रूहानी रहस्य प्रकट हो जाते हैं , उसकी जुबान बन्द हो जाती है । कबीर साहिब कहते हैं :
बाबा अगम अगोचर कैसा , तातें कहि समझाओं ऐसा ॥ जो दीसै सो तो है नाहीं , है सो कहा न जाई । सैना बैना कहि समझाओं , गूंगे का गुड़ भाई । कबीर साहिब की शब्दावली , भाग 1 , पृ .71