परमात्मा बुद्धि की शक्ति से नहीं पाया जा सकता और न ही तर्क यानी दलील के द्वारा उसके होने का सबूत दिया जा सकता है । वह कैसा है , कहाँ है आदि के बारे में सब सोच – विचार व्यर्थ है ।
कबीर साहिब कहते हैं : बासुरि गमि न रैणि गमि , नाँ सुप . तरगम ‘ । कबीर तहाँ बिलंबिया , जहाँ छाहड़ी न घंम ।
अर्थात् न वहाँ दिन की पहुँच है , न रात की और न ही वहाँ सपनों के घोड़े पर सवार होकर पहुंचा जा सकता है । कबीर उस स्थान पर विश्राम कर रहा है जहाँ न धूप है न छाँह ।
परमात्मा सुख और दुःख , भले और बुरे , स्वर्ग और नरक आदि सब प्रकार के द्वैत से परे है । उसकी कल्पना नहीं की जा सकती । संत उस परम चेतन के धाम में विचरते हैं । जो प्रभु को पा लेते हैं वे तर्क और वाद – विवाद में नहीं उलझते , जैसा कि कबीर साहिब ने कहा है , जो देखै सो कहै नहि , कहै सो देखै नाहिं ।
शरीर के अंदर यदि एक बार अभ्यासी परमात्मा को अपने अंदर प्रकट कर ले तो बाहर भी वह उसकी मौजूदगी कण – कण में देखता है । संत कहते हैं कि जब भक्त भगवान को अपने शरीर के अंदर देख लेता है तभी वह उसे सृष्टि के कोने – कोने में देख सकता है । कबीर साहिब कहते हैं कि जब तक मैं स्थूल शरीर के कामकाज में उलझा हुआ था तब तक परमात्मा मुझ से अलग था । जब मैंने अपने अंतर में उसका ज्ञान पा लिया तो जहाँ कहीं भी मैं देखता हूँ , केवल उसे ही पाता हूँ :
जहाँ जहाँ जाइ तहाँ तहाँ राँमा , हरि पद चीन्हि कियौ बिश्रामा ॥ तन रंजित तब देखियत दोई , प्रगट्यौ ग्यान जहाँ तहाँ सोई ॥ लीन निरंतर बपु बिसराया , कहै कबीर सुख सागर पाया ॥
एक सच्चे साधक के लिए परमात्मा शरीर के अंदर ही है । वह किसी जंगल , गुफा या पर्वत में नहीं है । न वह मनुष्य के बनाए हुए किसी मंदिर , मसजिद या गिरजे में रहता है और न ही उसे किसी मूर्ति या चित्र में सीमित किया जा सकता है । कबीर साहिब कहते हैं कि हमारे शरीर के अंदर ही वह अघट यानी शरीर रहित , अपार प्रभु रहता है , घट मह खेलै अघट अपार
कबीर साहिब आश्चर्य प्रकट करते हैं कि वह शरीर रहित परमात्मा मनुष्य के शरीर में रहता है , फिर भी लोग उसे प्राप्त करने की कोशिश नहीं करते : बसे अपंडी पंड 2 मैं , ता गति लखै न कोइ । कहै कबीरा संत हौ , बड़ा अचंभा मोहि ॥
ईसा मसीह समझाते हैं : ख़ुदा की बादशाहत न यहाँ है , न वहाँ है , वह तुम्हारे अंदर है ।
इसी प्रकार कबीर समझाते हैं कि वह परमात्मा कहीं भी कम या ज़्यादा मात्रा में नहीं है , वह सबमें पूर्ण रूप से व्याप्त है , घटि बधि कहीं न देखिये , ब्रह्म रह्या भरपूरि । और तेरा साहिब तुज्झ में , अंत कहूँ मत जाय ॥
अपनी प्रसिद्ध वाणी ‘ बावन अखरी ‘ में कबीर साहिब कहते हैं कि वह जो तुम्हारे निकट , तुम्हारे शरीर में है , उसको छोड़कर क्यों भटकते हो ? जिसकी तलाश में दुनिया भटक रही है , उसे मैंने अपने निकट ही पाया है । ढढा ढिग 4 ढूढह कत आना ॥ ढूढत ही ढह गए पराना ॥ इसी पद में आगे कहते हैं कि मैंने उसे सभी दिशाओं में , यहाँ तक कि ऊँची पर्वत – श्रेणियों में ढूँढ़ा परंतु नहीं पा सका । जब मैंने अपने अंदर देखा तो जिह गड़ गडिओ सो गड़ मह पावा ॥ अर्थात् जिसने इस गढ़ ( शरीर ) को बनाया है , उसे मैंने इस गढ़ में ही पा लिया ।